A few words strung together that made sense to me.
Friday, December 26, 2008
कैसे लिखूं
कुछ नवा लिखने को मैं गुज़रे ज़मानों को घटाता चला गया उन लिखी बातों को भूलता चला गया पर तकदीर का इम्तेहान आज भी ना काबू में है हर आंसू के संग मैं अपना दर्द बढ़ता चला गया बाँट तो लेते हैं अपनी कहानी कभी कभी औरों को उनकी की कहानी याद दिलाता चला गया
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