गैर बने अपने, कोई अपने बने गैर
रिश्तों का क्या माईना समझ ना आया
टूटे धागों से बिखरे जा रहें हैं
कोई उनमें गाँठ क्यों नहीं लगता
जाने कब से यह सपने बुने जा रहा हूँ
पर कैंची लिए कोई उन्हें काटे जा रहा है
मेहनत तो करे जा रहा हूँ
साथ रहने का कोई आसार नज़र नहीं आ रहा है
उल्टे चुम्बक से इक दूसरे से दूर हुए चले जा रहे हैं
सारे बस अपनी ही दुनियाओं में
काश कभी कदम मोड़ लेते
जुदा न होते कहीं इन काइनातों में
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