A few words strung together that made sense to me.
Tuesday, June 12, 2012
पाया मैंने सब कुछ टुकड़ों में
उम्र बीत चुकी जोड़ते जोड़ते
Sunday, April 29, 2012
घुट घुट के जीना अब आदत सी बन चुकी है
के अब ख़ुशी के अलफ़ाज़ ही नहीं निकलते
आज हम दर्द के मारे कुछ बोल तो देते हैं
और वो आंसुओं से पोंछ देते हैं
ऐसी मोहब्बत किस काम की
जो दूसरों को रुलाती रहे
और हमें रोज़
इस दर्द के तले दबाती रहे
कभी सोचते हैं के, खुद को मिटा देना ही गर हो मुमकिन
तो कर लेते, लेकिन
कौन संभालता उनको
जो हैं साथ मरने वाले
Monday, April 23, 2012
मुंह फेर लेना इक अदा ही नहीं
कभी मजबूरी भी होती है
वरना यह काफिर क्यों
खुदा के घर से लौट आता
Sunday, April 1, 2012
चंद रोज़ में इक नए रास्ते पर चल पडूंगा धुंदली उन पहाड़ियों के पार कहीं इक सागर से जा मिलूंगा उस सागर के किनारे कहीं इक छोटा सा झोपड़ा चैन की कुछ साँसें, अकेला