ज़ुल्म ऐ ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा क्या
ज़हर ऐ मोहब्बत पी चुके हैं
जाने क्यों गुस्से में कहर ढाते हैं
तेरा नाम ले जिए जाते हैं
इल्म तो था तेरा सबको, पहचान नहीं
ढूँढ़ते रहे कभी मेहखानों में तो कभी मीनारों में
दिखता रहा तू हमेशा
कभी सड़कों पे तो कभी अफसानों में
हम तो रहे तेरे वफादार हमेशा, शम्मों की तरह
फर्क क्या अब मुझमें और उन दीवानों में
Nice one keep it up
ReplyDelete