Friday, January 30, 2009

तेरी आंखों में ख़ुद ब ख़ुद जाने कैसे डूब जाता हूँ
झलक सी तेरी रहती है बस मैं जाने कहाँ खो जाता हूँ
बंद तेरी पलकों में मेरी चाहतें, मेरा प्यार
बंद तेरी पलकों में मेरी ज़िन्दगी जाने में कैसे जीता हूँ

Wednesday, January 28, 2009

मिसाल

आबाद होते रहे होने वाले, बरबादियों में हम जीते हैं
जाम वो छलकाते रहे, दर्द के कुछ घूँट हम पीते हैं
मिसाल दी थी तेरी ऐ खुदा ज़माने ने
पूजते रहे वो, बुत बने हम जीते हैं

Friday, January 23, 2009

झाँका जो उनकी आंखों में

झाँका जो उनकी आंखों में,
तस्सवुर बस अपना ही दिखता रहा
नकारते रहे वो उम्र भर,
पर झलकता आँसू हमें दिखता रहा

तकदीरों के गाँठ कुछ ऐसे बंधे,
खुलते तो न थे बस काट देते थे
कुछ पलों की खुशी के लिए
खून के आँसू बहा देते थे
कटी थी जुबां बचाने को उन्हें कभी
वरना आज भी उन्हें वापिस बुला रहे होते

Thursday, January 22, 2009

था आलम में सुकून

था आलम में सुकून, दिलों में खलबली मचलती रही
अंगारों में हम जलते रहे, मुस्कुराहटें बुझती रहीं

ठुकराए दिल के टुकड़े बांटता हूँ
इसी आस में की ज़िन्दगी जोड़ पायेगी कभी

उल्फत की ज़िन्दगी कहाँ चाही थी, थे ख्वाब हमारे भी कभी
जाने दो उन्हें अब टूट टूट कर थक चुके हैं, ज़िन्दगी और लाएगी कभी

कुछ उल्टे सीधे ख्याल

कर गुजरने की तमन्ना जाने क्यों लौट आती है
ढलती उम्र में फ़िर जीने की चाह क्यों जाग जाती है
शम्मे जले थे जो उनके आने पर
दबी मोहब्बतों की वो मशाल फ़िर क्यों जल जाती है
जी रहे थे हम कुछ गुमनाम इंसानों से, दूर उन पैमानों से
काफिर की जुबां पे दुआ क्यों आ जाती है
छोड़ते क्यों नहीं पहर इस बेहोशी की हालत में हमको
दर्द में ख़ाक खुशी नज़र आती है

Friday, January 9, 2009

काफिर

काफिर हूँ मैं गर,
खुदा क्या होगा
अँधा किया ज़माने ने जाने क्या क्या सिखा कर
अंधों को उनका चेहरा कहाँ दिखा होगा
दो अगर आँसू भी बहा दूँ दर्द में कभी
जाने वो क्या कर रहा होगा

क्या होगा

जंजीरों में बाँध खजाना भी दोगे तो क्या होगा
टूटे रिश्तों की डोर पकड़ा कर खुदा भी दोगे तो क्या होगा
कटी है उम्र तेरे सायों में, पनाह न दोगे तो क्या होगा
तसव्वुर रहा हमेशा तेरा सामने मेरे, असलियत में क्या होगा
सवालों में कटी ज़िन्दगी, जवाब न दोगे तो क्या होगा
आखों को मूँद कर सो जाऊं, शायद येही तकदीर मेरी
गर न उठा तो क्या होगा

सोच

बदलते रहे ख़ुद को ज़माने के लिए
अपने लिए ख़ुद को न बदल सके
बांटी थी खुशी सबसे लेकिन
चाहतों का गम बांट न सके
कुछ तो रहा होगा साकी उनमें
तस्वीरों के पन्ने पलट न सके

Tuesday, January 6, 2009

अनुभव

कुछ अनुभवों को बदलने को जाने कितने रंग लगाते चले गए
तस्वीर थी किसी की, किसी और की बनाते चले गए
फुर्सत में भी न मिला आराम, ख़ुद पे इल्जाम लगाते चले गए
जो न मिले वो, बेगानों को अपना बनाते चले गए

Monday, January 5, 2009

सवाल

ख़्वाबों सी हँसी ये दुनिया
आँख खोल लेता तो क्या होता
काफिलों साथ चलता रहा
कतार तोड़ देता तो क्या होता
निभाए रिश्ते और दायित्व भी
न करता तो क्या होता
जवाबों की कमी न महसूस हुई कभी
सवाल पूछना छोड़ देता तो क्या होता
गैर को अपना बनाने से पहले रिश्ते टूटते क्यों हैं
मुजरिम करार हुए नहीं, जंजीरों में हाथ बंधे क्यों हैं

निभाना

चाहतें दबाने से कभी दबती नहीं
उम्मीदें बाँधने से कभी बंधती नहीं
जो कलपते रहे तकदीरों पे रोज रोज
उनकी ज़िन्दगी कभी उभरती नहीं

शब्द लिखे लगते रहे बहुत आसान
निभाए निभती नहीं
धुल जाती हैं वो मुस्कुराहटें आसुओं में
कम्भक्त दिल की बातें मुझसे संभालती नहीं

लाचार सा इक कोने में पड़ा रहता हूँ
बेकारी में कलम घिसता रहता हूँ
कहने को रहा इतना की लिखता रहा
जाने ये ज़ुबान क्यों खुलती नहीं

Sunday, January 4, 2009

पत्थर

हरी वादियाँ
गुमनाम शेहर
कुछ घरोंदे
भूले पहर

दो दिन गुजार आया था उनमें गुमनाम मैं भी
ज़िन्दगी के कुछ पलों को भुला आया था
भटकता रहा जहाँ दिल ले गया
तेरी कुछ यादों को साथ जो ले आया था

उन तारों में तेरी आंखों की चमक
उन घटाओं में तेरे कजरे की महक
हर घूँट में मदहोशी थी तेरे प्यार की
उन अंगारों में गर्मी तेरे बाँहों की
उन पन्नों पे यादें बिछी थी चान्दिनी सी
हवा के झोकों से पलट भी गयीं

सपना सा था टूट ही गया, दो दिन का वक्त बस यूं ही छूट गया
अब मैं वापिस पत्थरों में हूँ, मेरा भी दिल पत्थर सा हो गया