Tuesday, December 16, 2008

मृगतृष्णा

आना जाना लगा रहा उसकी गलियों में
बिछड़ने के ख्याल से कदम मोड़ लेते
तसव्वुर का साथ रहा
वरना ज़िन्दगी का साथ छोड़ देते

जो गलती से कटे रास्ते हमारे
दबे अरमान फ़िर उभर आयेंगे
मुह फेर लेना दुआ करता हूँ
छुपते छुपाते हम भी चले जायेंगे

जो गलती से दिखे मेरा तसव्वुर
आँख बंद कर उसे मिटा देना
मृगतृष्णा समझ कर कोई
हमें भुला देना

1 comment:

  1. bahut khoob
    sach kaha hai aapne. isi tarh nirantar likhte rahiye.
    www.merakamra.blogspot.com

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