Monday, August 31, 2009

जिंदा लाशों के बीच, कफ़्न ओढे चलते रहे, ख़ुद से अमन पाने को
इस कफ़्न को मेरे ही खून में रंग देते, जो नामंजूर थी ज़िन्दगी इस ज़माने को

Friday, August 14, 2009

मुट्टी में भरी रेत तो रेत ही है, सरकती रही अपनों से जा मिलती रही
क्या रोकों मैं तुझको, के मेरा ही अंजाम कुछ और है

Thursday, August 13, 2009

उन आंखों से बहे आंसूओं को पानी न समझो
उन आंसूओं में इक कतरा खून भी मिला हुआ है
जो कभी वो मुस्कुरा भी दिए
उनके दिल में इक काँटा चुब रहा है

गर पोंछ सको तो उन भीगे गालों को पोंछ दो
के उन के आंखों में इक समुन्दर छुपा है
न मारो पत्थर उन लहरों को
के उन लहरों में इक तूफ़ान छुपा है

छोड़ दो देना साथ अपना, के बुझ चुके कई मशाल
इस रौशनी को ठंडे अंगारों का क्या पता है
झुलसते रहे अंगार इतने
के दर्द में आज तड़पने का कुछ और ही मजा है