दिन के उजालों में बदलते रहे उभरने वाले
रात की अंधेरों में दिखे कुछ चिरागों वाले
उनके नक्शे कदम पे चलते तो रहे
उनकी ठोकरों पे हम गिरने वाले
बताया था मुझको की तू गुज़रा यहाँ से कभी
या झूठे हैं तेरा रास्ता दिखाने वाले
जो हमारे हाथ चिराग पकडाया होता
होते कुछ कम अंध विश्वासों पे चलने वाले
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