नाफ्सियात - a collection of words
A few words strung together that made sense to me.
Monday, December 22, 2008
उम्र बढ़ी तो कैसी
नादान थे जब बिन कहे सब कह जाते थे
होश संभला भी कैसा, चाहते हुए भी कुछ कह न सके
तमाशा है की हकीकत जानते नहीं
मिलता था सब कुछ, अब कुछ मांगते नहीं
एक वक्त था की आगे की सोचकर चला करते थे
एक यह वक्त है के पीछे देखे जिया करते हैं
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