हरी वादियाँ
गुमनाम शेहर
कुछ घरोंदे
भूले पहर
दो दिन गुजार आया था उनमें गुमनाम मैं भी
ज़िन्दगी के कुछ पलों को भुला आया था
भटकता रहा जहाँ दिल ले गया
तेरी कुछ यादों को साथ जो ले आया था
उन तारों में तेरी आंखों की चमक
उन घटाओं में तेरे कजरे की महक
हर घूँट में मदहोशी थी तेरे प्यार की
उन अंगारों में गर्मी तेरे बाँहों की
उन पन्नों पे यादें बिछी थी चान्दिनी सी
हवा के झोकों से पलट भी गयीं
सपना सा था टूट ही गया, दो दिन का वक्त बस यूं ही छूट गया
अब मैं वापिस पत्थरों में हूँ, मेरा भी दिल पत्थर सा हो गया
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