Tuesday, September 29, 2009

हलकी सी बारिश
इक प्याला चाय
कुछ गुज़रे लम्हें
फ़िर याद आ जाए

वोह हलकी सी खुशबू
इक बहकी सी हँसी
दबी पैरों की आहट
उन सफों पे हलकी सी नमी

उन बद्रों से घिरे
तेरी बालों की छांव
तेरी छोटी सी आंखों
में इक चमक सी थी

पंखडियों से तेरे लब
थार थार कांपते हुए
उन गर्म साँसों में
मदहोशी सी थी

ख्वाब सी लगती
तेरी अंगडाई
आज ना जाने
ख्वाब सी फ़िर टूट गई

Tuesday, September 22, 2009

इन बजीचों में खिले थे सुर्ख गुलाब कभी
अब काँटों के समुन्दर दीखते हैं
उन खुश्क सुर्ख फूलों की खुशबू आज भी महेकती है
बिखरे उन काँटों को कौन याद किया करते हैं
उन फूलों की महफिल में, मेरा वजूद इक काँटा
ला-ज़वाल वो गुलाब, उनके खिलने से हम मिटा करते हैं

Monday, September 7, 2009

बारिश की कुछ बूंदों ने इस सूखी ज़मीं पर नमी फैला दी
दफ्न मुझे भी तेरी कमी महसूस करा दी
यह कैसी ख्व्वाइश तेरी ऐ-खुदा परवरदिगार
दो हाथ का फासला, हमेशा के लिए जुदाई करार दी