
रंग भरी इस दुनिया में यह सुर्ख उभरता क्यों हैं
जली उस मांग में उतरता क्यों हैं
मासूम उन हातों को यूं जकड़ता क्यों हैं
निचोडा है जिस्म को किसी सांप ने शायद
जली उस मांग में उतरता क्यों हैं
मासूम उन हातों को यूं जकड़ता क्यों हैं
निचोडा है जिस्म को किसी सांप ने शायद
बेरहम सूखे लहू की लकीरों में मेहंदी सा सजता क्यों है
कातिल हैं शायद उन ख़्वाबों का
मासूम एहसास और नादान वादों का
कुछ वक्त तक चमकेगा बिंदिया बनकर, गुम जायेगा
गुलाल सा इक दिन धुल जाएगा, मिट जाएगा फरेबी
कातिल हैं शायद उन ख़्वाबों का
मासूम एहसास और नादान वादों का
कुछ वक्त तक चमकेगा बिंदिया बनकर, गुम जायेगा
गुलाल सा इक दिन धुल जाएगा, मिट जाएगा फरेबी
बस वो नादान असलियत के सामने झुक जाएगा
चूर हो जाएगा