Wednesday, November 26, 2008

तू है तो मोहब्बत भी है

हर धड़कन पे जो नब्ज़ चले, तेरे ख्याल के आने पे
हर उलझन येही कहती है, तू है तो मोहब्बत भी है

रूकती क्यों धड़कनें, तेरे आने पे
हर साँस कहती है, तू है तो मोहब्बत भी है

कमबख्त कातिल सी लगे तू, तेरे चले जाने पे
आँसू की हर बूँद कहती है, तू है तो मोहब्बत भी है

चूर कर देती है सन्नाटों को, तेरी क़दमों के आहट
तेरी पायल की झंकार बता देती है, तू है तो मोहब्बत भी है

गले लगाने के ख्वाइश न मंज़ूर, तेरी तस्वीर ही सही
तेरे बालों में फूलों की खुशबू कह देती है, तू है तो मोहब्बत भी है

रूठ के यूं चले जाना, तेरा नया अंदाज़
तेरी जुदाई कहती है, तू है तो मोहब्बत भी है

रुखसत हुई तू बन किसी और की, तेरी यादें ही सही
तुझे मंज़ूर हुआ जो, वो है तो मोहब्बत भी है

गम के इस एहसास को, तेरी जुदाई ने दिया
दर्द में गुज़रे यह पल कहते हैं, तू है तो मोहब्बत भी है

कल आज और कल

हाल ऐ दिल मैं क्या बताऊँ, कल आज और कल में पिसता मैं गेहूं
पिंजरे मैं बंद मैं इक कैदी, अपने गुनाहों की सज़ा काटता हूँ

उम्र गुजारी है इस जिस्म मैं कैद, रूह का छूटना अब बाकी है
मुहफिजों की पहरेदारी की क्या ज़रूरत, चाँद सासें अब बाकी हैं

गुज़रते देखे हैं कई इस कैदखाने से कई मुज्रिम कई बेगुनाह
आम दिखते हैं, सब वक्त के कातिल, कौन बेगुनाह

कहानियाँ सुनी कई, मोहब्बत की, दुश्मनी की, बैमानी की और झूटी भी
तकल्लुफ दिखाते हैं, कुछ आँसू भी, रिहाई मांगते है सब पर माफ़ी नहीं

हम तो चुप रहे, कुछ पल, कुछ दिन, कुछ साल, कुछ सदियाँ, जीते रहे
पर बाखुदा इबादत करते रहे, बख्शीश मांगते रहे, कुछ कुछ मरते रहे

ताकते रहे कई अनजान पर उम्र रुखसत होने से रही
अपने भूल गए कहीं इन अंधेरों में, मौत को फुर्सत होने से रही

छोड़ चुका हूँ देखने ख्वाब जन्नत और जहन्नुम के, बस ठंडी सासें लेता हूँ
अंधेरों की जन्नत में जीता हूँ, सवेरों के जहन्नुम में मरता हूँ

Tuesday, November 25, 2008

मैं क्यों नहीं

देखे कुछ ख्वाब सच होते हुए, देखा कुछ लोगों को मुस्कुराते हुए
हर तरफ़ हैं फैले तेरे किस्से, उन किस्सों में मैं क्यो नहीं

देखे कुछ ज़ख्मों को भरते हुए, देखा कुछ लोगों को मंजिलों तक पहुंचते हुए
देते है दुआ सब तुझको, उन दुआओं में मैं क्यों नहीं

देखे कई नादान बच्चों को खेलते हुए, दोस्ती बढाते हुए
देते रहे शेह इक दूसरे को, पर मेरा कोई दोस्त क्यों नहीं

देखे कुछ सेहेरों पे बारिश होते हुए, निहारे कई बागान
देते हुए खुशबू फूलों को, पर मैं कभी खिला क्यों नहीं

देते है दुआ सब तुझको, उन दुआओं में मैं क्यों नहीं

Monday, November 24, 2008

आज

आज कुछ सदियाँ इक पल में समां गयीं
आज कुछ कश्तियाँ समुन्दर में समां गयीं

आज कुछ मुल्लाह दुबे अपनी कश्तियों में
आज टूटे कुछ ख्वाब उन बस्तियों में

आज से कोई वालिद न घर आएगा
आज से कभी कभी वो चूल्हा जल पायेगा

आज से उठेंगे कई सवाल उन बच्चों के
आज से न सजेंगे न बाल माँओं के

आज फिर शुरू होती है ज़िन्दगी इंसानों की
आज ख़त्म होती है ज़िन्दगी पैमानों की

मवाज्ना

यह कैसी नमी हैं बंद तूफानों में
यह कैसी कमी है बेमुहब्बत इंसानों में

यह कैसा मातम कि बरसते रहे
इश्क के नाम पे, हम तरसते रहे

मरासिम तो थे आस्मां और ज़मीन के
मरासिम तो हैं मोहब्बत और कमी के

अंधेरों बाद दिखती तो है रोशिनी
मिलते तो है आदम, हम ही नहीं

ऐ खुदा, क्या मवाज्ना करें
क्या जानें, तू है के नहीं

खुदगर्ज़

धुन्दला धुन्दला अब दिखता है, कैसा छाया है धुआं
पीने को पानी नहीं, खाली पड़ गया कुआँ

दिखते नहीं जंगल कहीं, न वो वादियाँ, न घरोंदे
बस, बस जाते हैं अपने अतीत में वो घरोंदे

निकल पड़ता है काफिला, अंधों का सुबह सुबह
पापी पेट भरने को, किसी भी तरह

लूट तो लिया इस धरती को हमनें, छोड़ा न कुछ बच्चों के लिए
खुदगर्ज़ हैं जो इतने, क्या होंगे किसी और के लिए

Saturday, November 22, 2008

ख्याल

रोते बच्चों से, जब सपने टूटे
सफेदी दिखती है अब इन बालों में
उम्र बढ़ी तो सही, कड़वापन भी
ज़ालिम कफन भी रंगा सफेदी में

Friday, November 21, 2008

जाम समझ पी जाता हूँ

कुफ्र ख्याल आते हैं मुझको
एक का इंतज़ार कम था
इक मायाँ में दो तलवारें
क्या इक का मसला कम था

मायाँ उठा चलता हूँ
ज़ालिम तलवार किधर गई
दुश्मन की क्या ज़रूरत मुझे
अपनी तलवार ही सही

काटे है तलवारों सी, उसकी आखें , इसकी आखें, सबकी आखें
ज़क्ख्मी हो गिर पड़ा हूँ
कतरा, कतरा, जमा कर खून का
जाम समझ पी जाता हूँ

हर्फ़

कई नज़्म लिखे जा चुके
कौन पढ़े इस ज़रा सी तुकबंदी को
कुछ अल्फाज़, जो कुछ कह न सके

लिखने की कोशिश तो करते है
हाल ऐ दिल, बयां हम भी
ज़ुबान अक्सर खामोश रह जाती
स्याही के कुछ धब्बे बिखरे अभी

हर्फ़ से अब दिखते हैं वो धब्बे
जुड़े अल्फाज़ उन कागजों पे कभी
जो समझ में आए रख लेता हूँ
ना आए तो फैंक देता हूँ

ज़िन्दगी बस सहम सी जाती है

दर्द और तन्हाई का कैसा सिलसिला
वफ़ा ख़ुद से ढूँढ़ते थक गया
तेरी इक नज़र मिले
इक लम्हे के लिए ऐ खुदा

देता न तू वास्ता यूं दर्द का
शक हो चला, तू ही नहीं
होता कुछ तो असर
इश्क मिलना मुझे, मंजूर ही नहीं

दोहराती रही ज़िन्दगी
आ कर चली जाती थी
कैसा बनाया बहाना
मिल कर यूं खो जाती थी
वो आखें, तड़पते लब
बिन बोले सब कह जाती थी
जाते हुए मुड़ना
वो नहीं उसकी रूह आ जाती थी
बसाया था दिल में जो उसको
बस उतने में खुश हो जाती थी

कहूं क्या तुझसे , जानता तू सब है
नादान दिल पे क्या सितम है
छोड़ा जो तुने जो उस तूफ़ान को
ज़िन्दगी बस सहम सी जाती है

दुनिया बनाई तुमने, नक्शे बनाये हमने

दुनिया बनाई तुमने, नक्शे बनाये हमने
दुनिया बदलती गई, नक्शे कदम भटकते गए

अंधेरों का सुरमा

रोशनाई ना मिले तो क्या, अंधेरों में कुछ चान्दिनी ही सही
अमीर बन ना पाए तो क्या, थोडी आमदनी ही सही

कोशिश करना नामुमकिन नहीं
अंधेरों का सुरमा लगा किरणों की और चल देते हैं

खुशियों के आने में वक्त है अभी

आईने के टुकड़े बिखरे नज़र आए
उन टुकडों में, मैं बिखरा नज़र आया

इक इक टुकडा उठा जोड़ने की कोशिश करता हूँ
इक इक कतरा लहू का रोकने की कोशिश करता हूँ

बिखरे हैं कई ज़ख्म काइनात में अभी
ज़ख्म भरने में वक्त लगेगा जानता हूँ

चिपकेंगे कब यह टुकड़े, पुरा होगा कब यह सपना
खुशियों के आने में वक्त है जानता हूँ

लाय्लत अल-बार’अह भी आयेगी कभी

मंजिल न होती तो रास्ता क्यों होता
उम्मीद ना होती तो खुदा क्यों होता

दिखाए जो रास्ता ज़िन्दगी का वोह मसीहा होता है
दिखाई ना दे मंजिल, पर वो खुदा होता है

जन्नत और जहन्नुम इक सिक्के के दो पहलू
उछालने वाला, वो खुदा होता है

चले जाते हैं, शायद मंजिल सही चुनी
तवक्को रखवाने वाले, उसका नाम खुदा होता है

अबकी शब्-ऐ बार’अत इबादत करेंगे कुछ और
लाय्लत अल-बार’अह भी आयेगी कभी

Thursday, November 20, 2008

आज फिर शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

पेट की आग तो बुझती नहीं
बादल भी आज कहीं दीखते नहीं
इक असरा हुआ है बारिशों को देखे
कडाके की धुप में अब बदन झुलसते हैं

मजबूरी में आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बीज बोते ही ज़मीन दरारों में फट गई
इक किसान की बेटी भूखी अपनी माँ से लिपट गई
आज फिर सेठ अपना सूत लेने आया है
अब वो मकान गिरवी रखने आया है

तकलीफ में आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

भुकमरी में जीने की थोडी आदत सी हो गई थी
प्यासे रहने की भी आदत हो गई थी
हम तो जी लेते लेकिन
हालातों में बच्चों तबियत ख़राब हो गई थी

बच्चों की खातिर आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बचे कुचे पैसों से आज टिकेट ले आया हूँ
बर्तन बेच कुछ खाने को ले आया हूँ
दो दिन लगेंगे शेहर पहुँचने के लिए
जाने किस मुह से भैसों को बेच आया हूँ

पलटते पलटते आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

गाड़ी में बठे बच्चों के सवाल उठते हैं
पूछते हैं की धरती हमारी माँ है, आप ही ने कहा था
दूध दिए भूख मिटाती थी भैसें, आप ही ने तो कहा था
घर जब यहाँ है, कहीं जाने की जरूरत नहीं, आप ही ने तो कहा था

खामोश आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

चुप थी बीवी अब तक, भोव्क्ला कर रो पड़ी
परदा किए मुह तो छुपा लिया, सिसकियों को छुपा ना सकी
आदर जो करना था पति का, दिल की बात बता ना सकी
दामन में छुपा लिया बच्चों को, जवाब न दे सकी

तड़पता, आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बीडी सुलगाये बैठा हूँ, आखों में धुआं लग घर के चुहले की याद दिलाता है
आँगन में खुशनुमा घराने की याद दिलाता है
खेतों में पकी फसल की याद आती है
उस भुकमरी जिंदगी से पहले की याद आती है

यादों के सहारे, आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

शेहर पहुंचे तो सही, फुटपाथ पे अब जीते है
काम मिलता नहीं, भीख मांगकर गुज़र करते हैं
उम्मीदें थी यहाँ आने से पहले, अब यादों पे गुज़र करते हैं
हमारा क्या है, बच्चे झूठे वादों पर गुज़र करते हैं

जाने कब गाँव की तरफ़ कदम उठेंगें
जाने कब कफन खरीदने को पैसे मिलेंगे
अब मैं,
बच्चों को झूठ बोलना छोड़ चुका हूँ
वापिस जाने के सपने देखना छोड़ चुका हूँ

मिले कुछ लोग मुझे आज चौखट पर

मिले कुछ लोग मुझे आज चौखट पर, हाल मेरा पूछने आए थे
पता था सब उन्हें, बस सवाल पूछने आए थे

राह गुज़रते हुए, झांकते है कई इन दरवाज़ों में
जाने क्या ढूँढ़ते हैं इन टूटी दीवारों में

थे यहाँ कई मर मिटने वाले
हैं यहाँ अब घुट घुट के मरने वाले

ज़माने का क्या हाल है, क्या पता नहीं हमको
चूला नहीं जलता उनका, चले आते हैं जलाने हमको

दफा हो ज़ालिम शहर वालों, ज़रूरत नहीं अब किसी की हमें
कफन पहने सोते हैं, कब्र ख़ुद ही खोद लेंगे

आवाज

सुनाइए देती हैं आवाजें कई इन हवाओं पर
पर इक आवाज़ जाने क्यों सुनाई नहीं देती
बहुत ढूंडा गलियों में बेतहा हुए
पर वो दिखाए नहीं देती

गम ऐ गुलशन के आइयेने बता
वो अपना पता क्यों नहीं देती
छुपाती है गम क्यों अपनों से
अपनी उल्फत बता क्यों नहीं देती

कहते नहीं है हम, उनका दर्द समझ सकते
हाथों में लिया जाम, छुडा नहीं सकते
पता होता के पलक झपकते यूं चले जाओगे
इन जल्लाद पलकों को काट फैकंते

फासला

ख्वाइशें बढती चली गयीं,
एहसास और असलियत का फासला कब दूर होगा ?

यादाश्त में तस्वीरें रह गयीं,
मोहब्बत और दर्द का फासला कब दूर होगा ?

चाह तो चाह रही,
इंसान होने का क़र्ज़ कब दूर होगा ?

भटकते रहे इन काफिलों के साथ,
राह और मंजिल का फासला कब दूर होगा ?

उम्र गुजरी है उम्मीदों पर लेकिन,
ज़िन्दगी से मौत का फासला कब दूर होगा ?

Wednesday, November 19, 2008

रुचिर का मुखौटा

देखें हैं सभी इक खुशनुमा इंसान को
वक्त पे सभी के काम आता है

दिखता नहीं जो किसी को
उसके उजड़ते बालों में साफ़ नज़र आता है

खुदा कैसा

हवा की फूँक से टूट जाए जो पेड़ तो वोह पेड़ कैसा
तूफ़ान ऐ ज़माने से झुक जाए वो इंसान कैसा

तकलीफें बढती गई, ज़ख्म तो नहीं भरा
कुछ कतरे खून के देख घबराए, वो ईमान कैसा

सरहद पर अक्सर दिखते है सन्नाटे फैले
जिस वतन में फैले सन्नाटे, वो वतन कैसा

भूक, तड़प, तकलीफें देख मुह फेर ले
आह छोड़, मुल्लाह की आवाज सुने वो खुदा कैसा

Tuesday, November 18, 2008

तखलीक

टेढी मेढी लकीरें बनाकर, इक तस्वीर बनाने चले
नादान, मिटा मिटा कर बनाते चले
नया कुछ बना ना सके नकल उतारते चले
देखा जो खुदा की बनाई तखलीक
उस बनी तस्वीर को मिटाते चले

ख्याल

मोहब्बत ना करी होती बुत इंसानों से हमने
खींच रहे होते डोर ज़िन्दगी की किसी बच्चे की तरह

खुश रहते अपने खिलोनों में
रो भी लेते कभी किसी बच्चे की तरह

तकल्लुफ

तकल्लुफ देने की आदत है उन्हें, समझाए नहीं समझते हैं
और एक हम हैं उनकी तक्लीफिएं, समझाए नहीं समझते हैं

निकल पड़ते हैं तब ज़माने से दोस्ती करने
यह फिराक कैसा की आज दोस्त भी दुश्मन सा लगता है

अब सहन करने के आदत ना रही दोस्त
अब मेरा तजुर्बा आदम का नहीं नमूना सा लगता है

वक्त का लगाया काँटा कभी पलटता नहीं, बढता चला जाता है
मौसम की भी तारीक है, सावन के बाद पतझड़ जो चला आता है

साकी

मुश्किल है जीना तकदीरों पे, लिखा क्या है उन लकीरों पे
समझ में न आए यह साजिश तेरी, फूल क्यों लटकाए है मेरी तस्वीरों पे

कत्ल ना कर दो मेरा, कुछ ख्वाईशें है बाकी
भटक गए है रास्तों से, मेरी मोहब्बत का पता तो बताओ साकी

पी लो कुछ घूँट और खून के यारों बेहोश होना है बाकी
हकीक़त में तो वो मिले नहीं, बेहोशी में ही नज़र जाती

लुत्फ़ उठाये थे उन लम्हों के, थे जो वो मेरे साथ
गुमशुदा हुए जब से वो, लगता है बहुत लंबी रात

उड़ जाऊं हवाओं में उस के दुपट्टे की तरह, फिक्र न रहे कोई
अब तो पी चुका हूँ बहुत यारों, नब्ज़ में अब धड़कन न रही

उधारी में लटका उमेश

कैसे उम्र उधारी में गुजारते हैं लोग, कैसे चाह बढातें हैं लोग
उधारी पे जी तो जायेंगे, सूत भरते भरते मर ही जायेंगे

Monday, November 17, 2008

ऐ दोस्त

एक अरसा हुआ ऐ दोस्त तुम्हें मिले हुए
एक अरसा हुआ है आपका हाल ऐ दिल सुने हुए
शुक्र है मिले हो आज फुर्सत से यहाँ
एक अरसा हुआ है ऐ दोस्त तुम्हें तलाश करते हुए

जिस तरह तुम मुःह फेर गुमशुदा हो गए
सोचा ना था कि मुलाक़ात होगी कभी
बीती बातों को नहीं छेढूंगा
माफ़ी मांगने का मौका दो तो सही

नज़र नियाज़ करता हूँ तुम्हारी हिम्मत पर
फक्र करता हूँ कि तुम खून के असूं पी तो गए
झेल गए तुम चुप चाप उन तकलीफों को
मुसक्रुराते तुम जी तो गए

हाथ बढाता हूँ तुम्हारी और,
शायद तुम्हें सहारे की ज़रूरत नहीं
ज़रूरत है हमें आप की दोस्ती की
और कोई मंज़ूर नहीं

बहुत तकल्लुफ उठायें हैं हमारी गलतियों के
जो कर चुके तुम्हारी ज़िन्दगी को तबाह
तवज्जो देना हमें भी कभी
निभा सकें दोस्ती इक दोस्त की तरह

थे यहीं, यहीं रहेंगे
आवाज़ दे देना हमको, हिचकिचाना नहीं
तुम्हारे न हो सके तो क्या
रहेंगे हमेशा तुम्हारे लिए

Sunday, November 16, 2008

कुछ ख्याल

देखा है आज समुन्दर से सूरज को उठते हुए
देखा है आज ज़िन्दगी को पासा बदलते हुए
आए कई मसीहा रास्ता दिखाने यहाँ
खुशनुमा मेहमान बने और चले भी गए

सिखा गए हमें उभरने के रास्ते
कोशिश करें साथ जो हम, इस पल को और जी लें
ज़रूरत रहे कुछ हिम्मत की, ताकत की नहीं
सुन लें उन सूफियों को, छोड़ दें अतीत की छड़ी
जमा कर लें अकाल इंसानियत की, बढायें सिर्फ़ ख़ुद को नहीं
तब बढ्ते देखेंगे फिरका ऐ इंसानियत को खुदा की और
साथ चलें हम भी

जी

उदास लगता है तू कि
मायूसकुन हुई है ज़िन्दगी
नाउम्मीद ना हो
दीखते हैं फूल सहारा में भी कभी

तकल्लुफ उठाते है लोग
इक बेहतर कल के लिए
रोशनियाँ दिखेंगी तो सही
माचिस जलाते हुए

तेरे हातों में है तेरी तकदीर
आसूओं में गम, मुस्कुराहटों में खुशी
छोड़ दे मसला-ऐ-दिल का
गुज़रते इन लम्हों में तो जी

फिकर करता है क्यों
बर्बादी ही सही
कामयाबी ना मिले तो
आज़ादी ही सही

Saturday, November 15, 2008

रंग

हाथ कांपते हैं दिवालों पे रंग लगते हुए
बेरंग इस ज़िन्दगी पे सफेदी चडाते हुए
लुत्फ़ उठाती ज़िन्दगी को क्या देखूं
मुझपे कफन ओदते, तुझे दुल्हन बनाते हुए

धुल गए रंग, बह गए वो दरियाओं में
अब किस रंग का वास्ता देगा
लहू भी अब हो चला है बेरंग
ऐ खुदा बोल अब तू कौनसा रंग लेगा

शिकायत नहीं अब कोई लेकिन
दिल की इक तमन्ना रही
कर दे नबीना हमको
काइनात को न दे अंधेरे कोई

खुश रहो

खुशियाँ तुझे दे खुदा हर मोड़ पर
दे दे मुझे तेरी हर तकलीफ
मिले तुझे हर ख्वाब तेरा
ले ले अब मेरी तकदीर

मिलें हमेशा जो तेरा दिल चाहे
ना मिले कोई गम
मिले बरकत तेरे हातों को
बे-दाग़ रहें तेरे कर्म

दे इज्ज़त बुजुर्गों को हमेशा
इबादत न भूलना
रहाइश गह को मकान बनाना
मेहमानों को न भूलना

माना बहुत कुछ बोल गया हूँ
पर ख़ुद को मसरूफ रखना
करना जो मानिंद हो तुझे
बस दूसरों का ख्याल रखना

जो हुए तकलीफ
कह देना दुआ करता हूँ
खुश रहना हमेशा प्यारी बहना
अब चलो, अलविदा कहता हूँ

बिजलियाँ

दिखती है अंधेरों में अक्सर वो बिजलियाँ
जलाये हमें अक्सर वो बिजलियाँ

ना-मुकम्मल मिलेंगे कई नज़्म बिखरे हुए
इबादत कराये हमे अक्सर वो बिजलियाँ

लिखते रहे अंधेरों में जाने क्या अल्फाज़
मिटाती रही बारिशें, साथ अक्सर वो बिजलियाँ

मुश्ताक कमाई करें, ख्याल करते तो रहे
मश्रूब सड़कों पे, साथ अक्सर वो बिजलियाँ

सुने कोई इन नज़्मों को, उम्मीद तो नहीं
गिरती नहीं इक जगह पर, अक्सर वो बिजलियाँ

Friday, November 14, 2008

बसर

तुमको एक पैमान पेश करता हूँ
अंसुओं का एक जाम पेश करता हूँ
इक छोटा सा आशियाँ हमारा
तनाह ही बसर करता हूँ

गुज़र चुके हैं कई साल यहाँ
जा चुके हैं सभी जाने वाले
दीखते हैं सिर्फ़ गुमशुदा आने वाले
सिम्त पूछते है गुज़र जाने वाले

साथ रहा अब सिर्फ़ आइयिनों का
दीखते नहीं अब सराब भी कभी
चौखट पर आस लगाये बैठे हैं
आ जाए गुमशुदा मौत भी कभी

हीर राँझा


उन यादों पे जीते आए
ज़ख्म कुरेदकर लहू देखते आए
तारिक हमेशा दुहराती रही
कुछ और रांझे मरते आए


तकल्लुफ क्या है ज़माने को
खुशी देखना मंजूर नहीं
मार दिया उन हीरों को
क्या उनकी कोई तकदीर नहीं


तमाशा देखे है यह दुनिया
मारने वाले उन वीरों को
बस छाप जाते हैं
मरने वालों की तस्वीरों को


ऐ खुदा क्या यह मंज़ूर तुझे
क्या खुशी देना मुनासिफ नहीं
माना कुछ ना जाने मोहब्बत
बाकी क्या इंसान नहीं


करता गर तू सब को एक बराबर
मिलता सबको थोड़ा प्यार
ना होता दर्द किसी को
ना होता कोई दुश्वार

खिदमत

वक्त की क्या बात करुँ
वो तो साथ ही नहीं
उम्र गुज़र चुकी
बस तेरा साथ नहीं

चाहत थी कभी, उम्मीदें भी
आस लगाये बैठे थे
कंकड़ कंकड़ जोड़ घर बनाया
साथी की आस लगाये बैठे थे

धुन्दला गयीं हैं यह आखें
दीखता अब दूर नहीं
सहारा ढूँढता बैठा हूँ
वक्त का साथ मंज़ूर नहीं

तुझ पे आस लगाये बैठे
खिदमत करते थके नहीं
टूट चुकी हैं ये उंगलियाँ
दुआ मांगने के काबिल नहीं

तड़प

चाह बिना तड़प कैसी
रह बिना झड़प कैसी
इन उदासियों का साथ नहीं
तो रहत कैसी

कट जाएँगी कई उम्रें
मिलेगी खुशी और गम भी
जो ना मिला इल्म खुशी का
तो दर्द की इन्तहा ही सही

सासें

दिया है हमें क्यों तकल्लुफ इतना
न चाहते हुए भी परेशान हम हैं
उम्र गुजरी है दूसरों की मर्जी से
अब ख़ुद जी लें क्या वोह भी कम है

दो रोटी के मोहताज हैं आदम
ज़िन्दगी के लिए वक्त कहाँ
चरों और आबादी ही आबादी है
खुदा को हमारे लिए वक्त कहाँ

सोचते हैं की खो जाएँ, गुम जाएँ
उन वादियों में जहाँ कोई नहीं
फ़िर सहमें रुक जाते हैं
परेशान, की हमसफ़र कोई नहीं

घर में कह्कशें बच्चों के तो हैं
माँ, बाप, भाई, बहेन, बीवी भी साकी
है सब कुछ और कुछ भी नहीं
बस चंद सासें हैं बाकी

हुए दो मरहूम

कई आए, कई गए, कुछ रुक भी गए
बने यार थोड़े और कुछ दुश्मन भी
भुला गए कई, कई भुला ना पाए
कुछ रिश्ते बने, कुछ बने नहीं

ज़ीनत दिखा दिखा कर
उकसाया था दिल को
ज़माने ने मजबूर करके
फ़साया था दिल को

यार भी थे कभी
दोस्त बन बैठे हैं आज
साथ चलते तो हैं कदम
एक दूसरे से निज़ात

जिम्मेदारीयों से मजबूर
रुखसत कर दिया अलविदाओं को
मुःह फेर लिया चाह-ऐ-दिल से
ज़ालिम ज़माने को दिखाने को

तकदीर तो लिखी थी तुने
क्या लिखा था यह भी ज़ुल्म
दी उम्र कैद की सज़ा
हुए दो मरहूम

चले क्यों गए

करीब आ कर चले क्यों गए
यूँ सता कर चले क्यों गए
चाहत बरक़रार है जानते है सभी
बेवफाई की वजह बिन बताये चले क्यों गए

मरासिम पुराने नहीं पर इकरार तो है
तकल्लुफ है, जानते हैं, निकाब तो है
मिलेगा कभी वक्त इंतज़ार करेंगे
तूफ़ान में न छोड़ोगे इमां तो है

मददगार-ऐ-जुर्म बनेंगे हम भी कभी
सज़ा-ऐ-जुर्म सहेंगे हम भी कभी
मिल जाए हमें साझी तुम्हारी
सजा-ऐ-मौत मंज़ूर हमें भी कभी

सोना चाहता हूँ

फैलाये है हाथ तेरी और
रोज दुआ करते हुए
लकीरों के सिवा
कुछ दीखता ही नहीं

बढती गई उम्र
लकीरें भी
बढती गई दुईएँ
तकलीफें भी

वक्त बस कट गया
आह भरते भरते
अब सेहत भी न रही
तकदीर से लड़ते लड़ते

थक चुका हूँ
सोना चाहता हूँ
रख बनकर
उस रेत में खोना चाहता हूँ

भगवान

थोड़ा सा प्रसाद बांटा
भूका था इंसान
मोती का मुकुट पहने-
बैठा है भगवान

वो कैसा है विधाता
भाग्य सब की है लिखवाता
ख़ुद मन्दिर में बंद
पत्थर बुत भगवान

दिये जले, आरती उतरी
गाये तेरे गुन गान
तू बैठा रास रचाए
सहे सब इंसान

आए इस धरती पर
कभी राम कृष्ण हनुमान
कर गाये कर्म अपने
आख़िर थे इंसान

अच्छे होते कर्म हमारे
न बनते हैवान
होते इस धरती पर
बहुत से भगवान

बिछडे दिन

शरारती आखें, मसरूफ कदम
छुपते छुपाते,
दौड़ते भागते
बिछडा वोह बचपन

ऐ खुदा उम्र तो बढ़ी है
उन्हें देख लौट आया बचपन
भुला ना पाए वो खेल गुल्लिओं का
वो लोरी, वो आवारापन

सुना जब दहलीज पर
वो खिलखिलाती हँसी
वो उछलना कूदना
वो पेड़ पे पतंग जो फँसी

याद आया माँ का लाड़
वो गुस्सा, वो इंकार
उनके हातों से खाना खाना
और वो आम का झाड़

अब दिखते है ख्वाबों में
धुन्दले से वो दिन
अब साफ़ दिखते है बेटी के आखों में
बिछडे वो दिन

काफिर कहे ज़माना

काफिर कहे ज़माना
यकीन तो हमें भी नहीं
दुआ तो रोज करते हैं
सिर्फ़ उन्हें ही नहीं

इस जालिम ज़माने पर करके भरोसा
जी तो नहीं पाये
अब तेरी उम्मीद पे ही सही
कुछ पल जी आए

क्या पाया, क्या खोया
अब कुछ याद नहीं
थोड़े अंगार उठे उन शोलों से
जले क्या पता ही नहीं

सरकाते हुए इन थके पैरों को
की कोशिश खुदा तक जाने को
मिल जाए कोई मसीअह
दुश्मन ज़माने से अमन कराने को

देखा ना था उन्हें
ना जन्नत, ना जहन्नुम
उम्र गुजार दी घुटने टेक कर
वफ़ा का इनाम क्या, बस ग़म

झुर्रियां निकल आई हैं
इंतज़ार करते करते
ना मिली मोहब्बत
ना खुदा इंतज़ार करते करते

अब निकलती नहीं दुआ
बस आह निकलती है
मिले ना किसी को मोहब्बत
ना खुदाई भी कभी