न आए, न बुलाये, न देखे, न बोले,
बस नज़रंदाज़ किए चले जाते हो
पहले की वो बातें न रहीं तो क्या,
इतरा के यूं क्यों सताते हो
हम कोई वेह्शी तो नहीं उठा ले जायेंगे,
नज़र जो कहीं आए बस आदाब कहे जायेंगे
जो उससे भी हो तकल्लुफ आपको बता दीजिये,
आज ही यह शहर छोड़ जायेंगे
सुन्दर रचना है।बधाई।
ReplyDelete