Saturday, December 13, 2008

कलप

कुछ बूंदों सी यह ज़िन्दगी बारास्ती रही
कुछ राहातों के लिए बस तरसती रही
कुछ लकीरें खिंची ऐसी नसीबों ने
पार करने को अखरती रही

कलपते देखे खुशाल चेहरे
जिनको अपना बना न सके
अकेले इस पार चलते रहे
मजबूर उस पार जा ना सके

जो जनाज़े निकले लोगों के
शामिल उनमें हम भी थे
उन गैरों में शायद
दिखें चेहरे अपनों के

ढूँढ़ते रहे जाने कब तक
इश्क की लौ उन की आखों में
खाली नज़रें मिलती रहीं
दर्द ही दर्द उनकी आहों में

वक्त लगा था समझने को
वो ना थे चेहरे अपनों के
हमसे थे वो भी मजबूर
कुछ मुर्दा चेहरे सपनों के

छोड़ चुके अब उम्मीदें जीने की
अब मौत में भी राहत नहीं
इश्क करने वालों को क्या
अब खुदाओं को भी मोहब्बत नहीं

बरसते थे, बरसते हैं, बरसते रहेंगे
वो आँसू मजबूरियों में
इस नादाँ दिल को क्या समझाएं
वो न थे तकदीरों में

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