Sunday, January 31, 2010

इक फूल तोडा था किसीने, कोने के गुलदस्ते को सजाने को
खिला था कुछ वक़्त के लिए, अब उम्र पड़ी है मुरझाने को
इक दिन सूख जाऊंगा, मिल जाऊँगा फिर उस मिट्टी में
फिर उभर आऊँगा कभी, तेरे दामन पे खिल जाने को

Friday, January 29, 2010

आखिर दर्द से मोहब्बत क्यों, के दर्द तो आखिर दर्द ही तो है
जिस हीरे को न तराशा, वो पत्थर भी हीरा तो है
क्या अपनाता पसंद इस ज़माने की, छिन लेने के रहे वो जो काबिल
तराशा सतह को तो समझा, के ज़माना बेदर्द ही तो है

Monday, January 25, 2010

अपने न बने अपने, न दूसरों को अपना बना पाए
देते दूसरों को क्या मिसाल, हम खुद को रास्ता न बता पाए