Monday, December 1, 2008

ख्वाबों की इक डोर

कोई उन नाज़ुक सी कलियों को तोड़ लाया
मेरे ख्वाबों की इक डोर कोई तोड़ आया
बागान को सजाने में उम्र लगी
लगा बाज़ार में आज एक फूल छोड़ आया

गुलाबों के कांटे चुभते रहे मगर
ज़माने से उन कतारों में बोता रहा
फूल खिले बेरंग जाने क्यों
सुर्ख रंगने को अपने लहू में डुबोता रहा

क़र्ज़ था कोई, के भरे हैं ज़माने में चाहने वाले
मोहब्बत कर न सके ज़ालिम, मिले ले जाने वाले
कोई उन नाज़ुक सी कलियों को तोड़ लाया
मेरे ख्वाबों की इक डोर कोई तोड़ आया

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