A few words strung together that made sense to me.
Friday, June 18, 2010
लो आज इक और अलविदा हो गया साथी था पर अब विदा हो गया कुछ वक़्त था जो उसके साथ हंस के गुज़ार लेते अब वो भी उस ख़ुशी से जुदा हो गया वो कैसा मकाम था उसे पाना ज़रूरी के वो इस रौशनी पर धुआं हो गया