Thursday, December 18, 2008

साया

आज मेरा साया जाने कहाँ खो गया, सुनसान अँधेरी गलियों में कहाँ छोड़ गया
ऐ चाँद तू तो लुटा ले थोडी सी चान्दिनी, लौट आए वो जो मुझसे नाराज़ हो गया

हम तो रहे साथी जाने कब से, कदम दर कदम मिला चलते रहे
उन उजालों में उभरते थे दोनों, इन अंधेरों में बिछड़ गए

मेरा अक्स भी तेरी जगह न ले पाया, उन शीशों को अधूरा पाया
अपने भी मुझे पहचान न पाये, जाने उन्हें क्या फर्क नज़र आया

तुझ बिन इन अंधेरों से निकलने को डरता हूँ, सहारा न रहा तेरा अब चलने को डरता हूँ
कुछ वक्त से अकेला इस कमरे में बंद हूँ, अब मैं रंगे सायों के संग हूँ

तेरे आने तक न इधर से हिल पाऊँगा और कुछ नहीं तो खुदा का नाम ले पाऊँगा
दुआ करूंगा के लौट आए तू कभी, दुआ करता हूँ के तेरा साथ निभा पाऊंगा

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