भुला सकता गर कोई उन यादों को, वो खुदा ही होता
होता इतना आसान, इन अल्फाजों को मैं मिटा रहा होता
लिख देता की नई शुरुआत हो हर सुबह, वहीँ जहाँ कल शुरू हुआ था
मुकम्मल हो वहीं जहाँ मैं तेरी बाँहों में सोया हुआ था
समझा न सका, या समझ ना आयी किसी को मेरी फरियाद
बता तो देता कोई, हाल ऐ दिल फ़िर सुना रहा होता
मौसमों को दुहराने की आदत रही, अंधेरों और उजालों को भी
गर वक्त को दायरों की समझ होती, वो भी तारीख दुहरा रहा होता
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