Monday, March 22, 2010

दिन इतने बेकार न आये अभी,
के हाल ऐ दिल गुन-गुना सकें
यह वरीदें अब सूख चलीं,
कतरा कतरा खून जाम समझ पी चुके
मसला ऐ ज़िन्दगी खुद न समझ सके,
दूसरों को क्या गले लगायें
जा तू जा ऐ दोस्त शायद
तुझे तेरी तस्वीर के लिए कोई अक्स मिल जाए

Friday, March 19, 2010

क्या सरहद क्या कौम इस दुनिया को बांटेगी
बस वो कौमी हैं जो खुद की हदों को बांटे जीया करते हैं
इन बेरहमों को क्या पता दर्द - ऐ - इंसानियत क्या होती है
उनको दिए ज़ख्मों में कुछ बूँद खून हमारा भी बहता है
हटाओ उन्हें इन कुर्सियों की दीवारों से जो सरहदें बनी बैठी हैं
आओ फिर बना लें इक जहान, जहाँ सिर्फ खुशियाँ रहती हैं
जहाँ हम तुम पड़ोसियों से गले मिला करते हैं
जहाँ हम तुम इंसानों से दिखा करते हैं

Thursday, March 11, 2010

इक कांटे की चुभन को यूं तुमने नकार दिया
के आगे वो तूफ़ान तुम्हारी मंजिल तो नहीं
इन आंसूओं को बहा ले जाने वाले सैलाब तुम तो नहीं
तुम क्या जानो हाल-ऐ-दिल बरबादियों का क्या होता है
के बर्बाद कर सबको तुम अपने रोष को कहीं और ले चले
क्या वफ़ा क्या मोहब्बत, मतलबी यहाँ सब हैं
कसूर क्या दें किसीको, के उस और कभी हम हैं
कैसा तूफ़ान था के हमारी पहचान को मिटा गया
उजड़े किनारों पे खड़े हम, और लोग पूछें के हम कौन हैं

Tuesday, March 9, 2010

हर ज़ख्म को तुम्हारी मोहब्बत का तोहफा समझ कर कबूल किया
और तुम हो के इक ज़ख्म खा कर ही बेवफा हो गए
किस्मत के पैरों तले रोंदा रेत का इक दाना हूँ में
सैंकड़ों इन दानों में दबा इक रेत का दाना हूँ में
तेरे इस रोशनियों में जला इक रेत का दाना हूँ में
जल के इक आइयेने सा चमका रेत का इक दाना हूँ में
हज़ारों टुकड़ों में तोडा इक आइयेना हूँ में
बस दूसरों के अक्स से भरा इक आइयेना हूँ में
मेरा क्या वजूद के किस्मत के पैरों तले रोंदा इक टूटा आइयेना हूँ में