उसे कोसे क्या मिले मुझे, दर्द तो उसे भी है
फासलों से मैं डरता हूँ, दहशत उसे भी है
काट रहा हूँ घडियां, पल वो गिन रही
ज़माने के फैसलों की सज़ा मुझे भी है
आते जाते रहेंगे रह गुज़र कई यहाँ
कुछ उसे मिलें कुछ हमें यहाँ वहां
दो बातें कर पूछ लेंगे हाल ऐ दिल कभी
पर बता न सकेंगे विस्तार ऐ दिल कभी
ज़ख्मों को कुरेद्के कुछ ना मिलेगा
ख़्वाबों को अंधेरों के सिवा कुछ न मिलेगा
दिल में बसी रहेंगी कुछ महकी सी यादें
उन यादों को हकीकत में कुछ न मिलेगा
भूल जाना ही लगे है उन ज़ख्मों का मलहम
भुलाने को हमें ख़ुद को मिटाना पड़ेगा
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