चाँद से भरी रातों में अक्सर सोचा करते थे
लम्हों की बेलों से अक्सर कुछ यादों के फूल टूटा करते थे
बिखरते थे वो कुछ ख्वाबों से, सुन्दर सी इक ओढ़नी की तरह
खुशबू उनकी महकाती थी, उन यादों को फिर इक मृगतृष्णा की तरह
झूल जाती वो कभी हलकी सी पवन में ऐसे
के दबे पाँव कुछ नटखट सा करने को हो जैसे
पल दो पल वो घबरा के चुप सी रह जाती
जब कोई पास से गुज़र जाता
फिर उस पवन में बिखर जाती
टूटे इक ख्वाब की तरह