A few words strung together that made sense to me.
Thursday, October 22, 2009
क्या अँधेरा क्या उजाला पसीने से क्या कोई बाती जलाता क्या असल क्या सूद उधारी से क्या भूख मिटाता निचोडा लहू ज़िन्दगी ने मैं मौत को क्या गले लगाता क्या क़यामत क्या जन्नत ऐ खुदा तेरे नाम पे मैं ख़ुद को क्या मिटाता
इक आवाज़ उठी और फ़िर ठंडी हो गई इक बात कही फ़िर गुमशुदा सी हो गई सुना था इक नाम शायद पर इन नामों में फिर कहीं खो गए थी पहचान उन दोनों में जाने फ़िर कहाँ खो गए काश कहा था शायद काश ही कहा होगा मेरी तरह वोह भी इक गुमशुदा सा हुआ होगा निकला होगा तलाश में किसी की ख़ुद कहीं खो गया होगा दे इक और आवाज़ इक और कहार के तू यहीं होगा दिल का इक टुकडा शायद यहीं कहीं खोया हुआ होगा