Friday, December 5, 2008

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उन खिड़कियों में, तो कभी उन परदों से नज़रें ताकती थी हमें
उन किवाडों के भीतर से कुछ थमी थमी सी आवाजें बुलाती थी हमें
दिखती तो नहीं थी पर वो पायल की आवाज सुनाइए देती थी
परेशान हुआ करते थे, तब इल्म ऐ मोहब्बत न हुई थी हमें

मिले थे कभी उन गलियों में, उन बुतखानों में, कभी प्याला चाय नसीब होती थी हमें
ख़ुद की कभी तो उनकी कभी दो बातें कर लेते थे, लगता था की कुछ जल्दी थी हमें
रात के फासले बढ़ते चले गए, मिलन की घडियां कम होती रहीं
बेताब रहते थे हमेशा, तब इल्म ऐ मोहब्बत हुई थी हमें

आज उम्र ढल चली है, साथी थे वो कभी, हमसफ़र आज कोई और है
ख्वाब थे कभी, अब बसर कहीं और है,
खुशनुमा साथ तो रहा हमारा हमसफ़र, जाने दिल में आज भी कोई और है
ऐ खुदा अब सोचते हैं, गई उम्र में कभी इल्म ऐ मोहब्बत थी हमें आज कोई और है

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