Wednesday, December 23, 2009

मीनार बने खड़े रहे, मीनार इ नूर न बन पाए
भटके वो न रास्ते से, आज खुद को जला आये
कई दिनों से कुछ लिखा न था
था शौक मगर कलम उठा न था
शब्द पिघल कर बहते तो रहे
धारों को बाँधने मैं उठा न था

इक डोरी से बंधते थे वोह अलफ़ाज़ कभी
इक इक कर गांठों में बंधते थे कभी
मिलते बिछ्ड्ते इक गजरे में पिरो जाते थे
खिलते थे कभी
सूख भी जाते थे
सौंधी सी खुशबू छोड़ जाते थे
महेकती रहती रातें उन हलकी हवाओं में
इक मदहोशी सी छा जाती थी
फिर वोही ख्वाब दोहरा जाती थी
कुछ वक़्त बस यूं ही मस्त रह जाते थे
इ खुदा तेरे इस जहाँ से खो जाते थे

कई दिनों से कुछ लिखा न था
था शौक मगर कलम उठा न था
कलम क्या भरता जब आंसू ही सुख गए
बयां क्या करता जब वो डोर ही टूट गए