Friday, December 26, 2008

कैसे लिखूं

कुछ नवा लिखने को मैं गुज़रे ज़मानों को घटाता चला गया
उन लिखी बातों को भूलता चला गया
पर तकदीर का इम्तेहान आज भी ना काबू में है
हर आंसू के संग मैं अपना दर्द बढ़ता चला गया
बाँट तो लेते हैं अपनी कहानी कभी कभी
औरों को उनकी की कहानी याद दिलाता चला गया

धारा

उसे कोसे क्या मिले मुझे, दर्द तो उसे भी है
फासलों से मैं डरता हूँ, दहशत उसे भी है
काट रहा हूँ घडियां, पल वो गिन रही
ज़माने के फैसलों की सज़ा मुझे भी है

आते जाते रहेंगे रह गुज़र कई यहाँ
कुछ उसे मिलें कुछ हमें यहाँ वहां
दो बातें कर पूछ लेंगे हाल ऐ दिल कभी
पर बता न सकेंगे विस्तार ऐ दिल कभी

ज़ख्मों को कुरेद्के कुछ ना मिलेगा
ख़्वाबों को अंधेरों के सिवा कुछ न मिलेगा
दिल में बसी रहेंगी कुछ महकी सी यादें
उन यादों को हकीकत में कुछ न मिलेगा

भूल जाना ही लगे है उन ज़ख्मों का मलहम
भुलाने को हमें ख़ुद को मिटाना पड़ेगा

इंतज़ार

बूँद बूँद कर गिरे आँसू, धार बन बह जाने को
इक इक कर मुरझाये फूल, बारिश के आने को

जो यह आंसू खरे न होते ऐ फूलों तुम पे रो लेता
सींच न पता तेरे जड़ों को, कुछ तो भिगो देता

Wednesday, December 24, 2008

झोंका

इक मदहोशी सी थी आज की हवाओं में
भूली इक खुशबू फ़िर सुंघा गई
हलके से इक झोंके में
तेरा चेहरा फ़िर दिखा गई
उड़ते जाने कहाँ से इक पर्चा आया हातों में
कुछ तेरे लिखे ख़त सा दिखा गई
इस भीड़ में फ़िर मिलोगे कभी पता न था
अनजाने में ही शायद, तुझसे मिला गई
मोहब्बत से हुई उदय कहानी विवाह की
विवाह से हुई सांझ प्यार की
चक्र यह ज़माने से चलता रहा
ख़त्म न हुई घड़ी इंतज़ार की
खुशी बांटते थे कभी, अब सवाल पूछते हैं
थे कभी वो प्रेमी, अब तलाक़ पूछते हैं

विचार

मोहब्बत कम थी शायद, तभी अधिकार जमाते रहे
चुपचाप वो जाने कैसे प्यार बढाते रहे
ढूँढ़ते रहे रह गुज़र को जाने कहाँ कहाँ
घर में वो संसार बनाते रहे

Monday, December 22, 2008

उम्र बढ़ी तो कैसी

नादान थे जब बिन कहे सब कह जाते थे
होश संभला भी कैसा, चाहते हुए भी कुछ कह न सके

तमाशा है की हकीकत जानते नहीं
मिलता था सब कुछ, अब कुछ मांगते नहीं

एक वक्त था की आगे की सोचकर चला करते थे
एक यह वक्त है के पीछे देखे जिया करते हैं

नाउम्मीद

मिल बांट के खाना रहा तेरा सबक हमेशा
तकदीर बराबर बांटी क्यों नहीं

तेरा हाथ रहेगा हम सब पर कहती थी माँ
सर छुपाने को मकान क्यों नहीं

मोहब्बत सिखलाती रही कौम हमेशा
नफरत ही नफरत, शान्ति क्यों नहीं

जो दिया वो खुदा को मंज़ूर था, न दिया वो भी तुझे मंज़ूर
उम्मीद थी शायद उम्मीद ही होगी, नाउम्मीद तेरा नाम तो नहीं

महेश तेरी ज़िन्दगी की कहानी

पंछी से उड़ते रहे आजाद उन हवाओं में कभी
उमीदें थी इक घरोंदे की कभी
मिली खुशियाँ कुछ पल की
अब बंदिशें सदियों की

झूठे हैं तेरा रास्ता दिखाने वाले

दिन के उजालों में बदलते रहे उभरने वाले
रात की अंधेरों में दिखे कुछ चिरागों वाले
उनके नक्शे कदम पे चलते तो रहे
उनकी ठोकरों पे हम गिरने वाले
बताया था मुझको की तू गुज़रा यहाँ से कभी
या झूठे हैं तेरा रास्ता दिखाने वाले
जो हमारे हाथ चिराग पकडाया होता
होते कुछ कम अंध विश्वासों पे चलने वाले
खुशियों ने यादों की सिवा दिया कुछ भी नहीं
मुश्किलों ने हमें कुछ तो सिखाया होगा
गलतियाँ हुई अक्सर
हम ने की न थी, खुदा ने कराया होगा
वो करता रहा एहसान जाने कितने
असल चुका न सके तभी सूद बढाया होगा

Friday, December 19, 2008

ख़ाक और खून

उस ख़ाक को खून से सींच के गुल उगाये हैं, वो फूल किसी के कब्र पे छोड़ आए हैं
गुल था वो तो तेरे नाम का और कब्र मोहब्बत के नाम का

कहानियाँ

करीबी थी कैसी, दूरियां बना गई
अधीन थे तुमपर, मजबूरियां बना गई
ख़त्म हुआ किस्सा, तन्हाई रह गई
हकीकत में जीते हैं, बस कहानियाँ रह गयीं

आदाब

न आए, न बुलाये, न देखे, न बोले,
बस नज़रंदाज़ किए चले जाते हो
पहले की वो बातें न रहीं तो क्या,
इतरा के यूं क्यों सताते हो

हम कोई वेह्शी तो नहीं उठा ले जायेंगे,
नज़र जो कहीं आए बस आदाब कहे जायेंगे
जो उससे भी हो तकल्लुफ आपको बता दीजिये,
आज ही यह शहर छोड़ जायेंगे

Thursday, December 18, 2008

काश हम भी होते नादान किसी बच्चे की तरह
कुछ वक्त रो लेते फ़िर चुप हो जाते

हम भी जाने क्यों बहरे होते रहे

खुशहाल थे सभी अपनी ही दुनिया में, औरों को भूल गए
दिलों की आवाज़ छोड़ तर्क करते रहे
बुने थे जो सपने उधढ्ते रहे
कोसते रहे जाने किस किस को, सुना किसी ने नहीं
हम भी जाने क्यों बहरे होते रहे

साया

आज मेरा साया जाने कहाँ खो गया, सुनसान अँधेरी गलियों में कहाँ छोड़ गया
ऐ चाँद तू तो लुटा ले थोडी सी चान्दिनी, लौट आए वो जो मुझसे नाराज़ हो गया

हम तो रहे साथी जाने कब से, कदम दर कदम मिला चलते रहे
उन उजालों में उभरते थे दोनों, इन अंधेरों में बिछड़ गए

मेरा अक्स भी तेरी जगह न ले पाया, उन शीशों को अधूरा पाया
अपने भी मुझे पहचान न पाये, जाने उन्हें क्या फर्क नज़र आया

तुझ बिन इन अंधेरों से निकलने को डरता हूँ, सहारा न रहा तेरा अब चलने को डरता हूँ
कुछ वक्त से अकेला इस कमरे में बंद हूँ, अब मैं रंगे सायों के संग हूँ

तेरे आने तक न इधर से हिल पाऊँगा और कुछ नहीं तो खुदा का नाम ले पाऊँगा
दुआ करूंगा के लौट आए तू कभी, दुआ करता हूँ के तेरा साथ निभा पाऊंगा
तुम हम और तन्हाई का साथ कैसा
साथ रहे पर दूरियों का एहसास कैसा
जो कोई उस चुप्पी को तोड़ देता
उन अनकही बातों का आभास कैसा
इन लकीरों को समझ सकते, ख़ुद का नसीब ना संभल लेते
ज़माने ने जो छीना मुझसे, उसको न बचा लेते

Wednesday, December 17, 2008

गैर बने अपने, कोई अपने बने गैर
रिश्तों का क्या माईना समझ ना आया
टूटे धागों से बिखरे जा रहें हैं
कोई उनमें गाँठ क्यों नहीं लगता

जाने कब से यह सपने बुने जा रहा हूँ
पर कैंची लिए कोई उन्हें काटे जा रहा है
मेहनत तो करे जा रहा हूँ
साथ रहने का कोई आसार नज़र नहीं आ रहा है

उल्टे चुम्बक से इक दूसरे से दूर हुए चले जा रहे हैं
सारे बस अपनी ही दुनियाओं में
काश कभी कदम मोड़ लेते
जुदा न होते कहीं इन काइनातों में
सहराओं पे बैठे सोचते हैं, क्या वो लहर थी या कहर थी कोई
जाते जाते इन सहराओं पे जाने क्यों हरयाली फैला गई

कांटे तो थे दिल में अभी, पर वो फूलों के बिस्तर पे सुला गई
जाते जाते जाने क्यों हमपे अपनी चाहतें लुटा गई

देखा जो उन आसमानों को, बादल बरसने लगे
रोते रोते जाने क्यों बादलों में अपना चेहरा सा दिखा गई

चाहते हैं की गाढ़ लें खुदको इस ज़मीं में अभी
द्रख्तों से उभर आयें और छु लें उन्हें कभी
लहरों से आए, बहा ले गए जाने कब हमको
क्या पता था यूं सहराओं पे छोड़ चले जायेंगे
दिल पे लगा ज़ख्म तो भर जाएगा
वो कम्भाक्त काँटा ना निकाल पाएंगे
किसी आशिक से उसके दिल का हाल ना पूछना
उसकी तकदीर ही टूटी थी कोई सवाल ना पूछना
छोड़ देना उसको उसके हाल पे
कोई एहसान करने का तकल्लुफ न करना

Tuesday, December 16, 2008

मृगतृष्णा

आना जाना लगा रहा उसकी गलियों में
बिछड़ने के ख्याल से कदम मोड़ लेते
तसव्वुर का साथ रहा
वरना ज़िन्दगी का साथ छोड़ देते

जो गलती से कटे रास्ते हमारे
दबे अरमान फ़िर उभर आयेंगे
मुह फेर लेना दुआ करता हूँ
छुपते छुपाते हम भी चले जायेंगे

जो गलती से दिखे मेरा तसव्वुर
आँख बंद कर उसे मिटा देना
मृगतृष्णा समझ कर कोई
हमें भुला देना

Monday, December 15, 2008

तेरे आने के

तेरे आने के राह ताक रहे सभी, आशिक तेरे सब जानते हैं
तेरे दीदार को तरसते दीवानों को कौन पहचानते हैं
तुझे देखे आज भी जाने क्यों लगता है,
दिल में और कोई नहीं बस हम छुपे हुए हैं

यह तकल्लुफ कैसा रहा तुम्हारा
दोहरी ज़िन्दगी जिए जा रहे हो
दिल में हैं चाहतें किसी की
ज़ुबान से नाम किसी का लिए जा रहे हो

सवाल

कुछ तो था जो तुम यूं मुह फेर गए
कुछ तो था जो तुम रिश्तों के धागे उधेड़ गए
टूट सको तुम यूं मुमकिन ही नहीं
कुछ तो था जो तुम यूं मुह फेर गए
हैं आंखों में जड़े ख्वाइशों के कुछ मोती चमकते हुए, खूबसूरती को तुम्हारी चुरा ना लें
गुमशुदा जो रहे तुम ख्यालों में, कहीं हम तुम्हारा दिल चुरा ना लें

अजब ज़िन्दगी

कैसी यह अजब ज़िन्दगी, इक रेखा सी चली जाती है
जो कुछ करना चाहूं, उन कतारों में फ़िर खेंच लाती है
इक वक्त था जब लोगों को आदाब कहे चले जाते थे
यह वक्त है कि पंक्तियों में खड़े रह जाते हैं

उस कतार को भीड़ में बदलते वक्त न लगा
रुके रहे काम जो उस कागज़ पे ठप्पा न लगा
इक दो उन खिड़कियों में चिल्लाते रहे सभी
जिन्दों कि बात छोड़ो मुर्दों को भी आराम न मिला

आंकडों

आंकडों जैसी ज़िन्दगी बीती मेरी
एक से बहु का सफर करते रहे
बहुत में जीने के आदि
कम में गुज़र करते रहे

जो दिया एक अंक हर खुशी को
दर्द हर अंक को घटाते चले गए
उम्र गुजरी उन अंकों को बढ़ाने में
ज़िन्दगी के पल बस घटते चले गए

Saturday, December 13, 2008

छोड़ गए तुझे जो अंधेरों में ज़ख्मी
वो हम नहीं, मोहब्बतों के कातिल थे
छोड़ गए जो हमें दफन उसूलों की दीवारों में
वो इंसान नहीं, तकदीरों के कातिल थे
ज़माने को ठोकर मारी जो हमनें, हम इंसान कहलाने लायक ना रहे
इंसानों को ठोकर जो मारी तुमने, तुम खुदा कहलाने लायक ना रहे

कलप

कुछ बूंदों सी यह ज़िन्दगी बारास्ती रही
कुछ राहातों के लिए बस तरसती रही
कुछ लकीरें खिंची ऐसी नसीबों ने
पार करने को अखरती रही

कलपते देखे खुशाल चेहरे
जिनको अपना बना न सके
अकेले इस पार चलते रहे
मजबूर उस पार जा ना सके

जो जनाज़े निकले लोगों के
शामिल उनमें हम भी थे
उन गैरों में शायद
दिखें चेहरे अपनों के

ढूँढ़ते रहे जाने कब तक
इश्क की लौ उन की आखों में
खाली नज़रें मिलती रहीं
दर्द ही दर्द उनकी आहों में

वक्त लगा था समझने को
वो ना थे चेहरे अपनों के
हमसे थे वो भी मजबूर
कुछ मुर्दा चेहरे सपनों के

छोड़ चुके अब उम्मीदें जीने की
अब मौत में भी राहत नहीं
इश्क करने वालों को क्या
अब खुदाओं को भी मोहब्बत नहीं

बरसते थे, बरसते हैं, बरसते रहेंगे
वो आँसू मजबूरियों में
इस नादाँ दिल को क्या समझाएं
वो न थे तकदीरों में

Thursday, December 11, 2008

कुछ मंजिलें रहीं ऐसी, पहुँच कर भी दूर रहे
अरमान रहे हमेशा, ज़माने के हाथ मजबूर रहे

तुलना

तुलना करने बैठा था मगर, अच्छाइयों को तोल बैठा
जब बुराइयों की बारी आई, ख़ुद को निचोड़ बैठा
जाने कैसे गुन गया किसी आटे की तरह
उन तहों में दबा मैं, कोई उस रोटी को तोड़ बैठा

रिश्ते

बाग़बान से पूछे क्या होगा, गुलिस्तान उसके दामन में तो है
फूलों से सजे बुतों को क्या होगा, कांटे हमारे बंधन में तो है
एक बराबर कोई नहीं, ना फूल ना तुम
एक उठाये क्या होगा, चाहत में सारे रिश्ते तो हैं

दूरियों पे रहने वाले

जाने कैसे आज उन्हें हमारी याद आई, जाने कैसे वो जुबां लड़ा गए
उनके चुप रहने के आदि हो चुके थे, जाने कौन आज उनपर हावी हो आए

दो बातें की तो सही चाहे उल्फत की ही , जाने कब तक वो अल्फाज़ कान में गुनगुनाये
दूरियों पे रहने वाले, जाने आज हमारा रास्ता कहाँ भूल आए

Wednesday, December 10, 2008

इनकार ऐ हकीक़त

थे करीब हम भी कभी, एहसान ऐ मुलाकातें आज भी हैं
दोस्ती रोज़ निभाते रहे, कुछ दबी बातें आज भी हैं

एहसासों को बांटे ज़माने हुए, दामन पे दाग आज भी हैं
दफन किया रोज़ मोहब्बतों को, ज़ुबान पे नाम आज भी है

इनकार ऐ हकीक़त रहा मुशकिल, जाने कैसे करते रहे
उनके देखे जीते रहे, राज़ ऐ मोहब्बत लिए मरते रहे

अलविदा

कोई तो था जो बुलाता था मुझे
कोई तो था जो कभी मुस्कुराता था
वाकिफ तो था उनसे मगर
कोई तो था जो कल मुझे छोड़ गया

बेज़ुबान

बेज़ुबान कर चुकी थी बेडियाँ ज़माने की
जाने कहाँ से उभर आती थी वो बातें दिल में कभी
जो न हुई बयां जुबान से, आखें बयां कर देती थी
कुछ एहसास दिखा, छुपाने को, आसुओं से सफा कर देती थी

Sunday, December 7, 2008

कहर

ज़ुल्म ऐ ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा क्या
ज़हर ऐ मोहब्बत पी चुके हैं
जाने क्यों गुस्से में कहर ढाते हैं
तेरा नाम ले जिए जाते हैं

इल्म तो था तेरा सबको, पहचान नहीं
ढूँढ़ते रहे कभी मेहखानों में तो कभी मीनारों में
दिखता रहा तू हमेशा
कभी सड़कों पे तो कभी अफसानों में

हम तो रहे तेरे वफादार हमेशा, शम्मों की तरह
फर्क क्या अब मुझमें और उन दीवानों में

Friday, December 5, 2008

...

उन खिड़कियों में, तो कभी उन परदों से नज़रें ताकती थी हमें
उन किवाडों के भीतर से कुछ थमी थमी सी आवाजें बुलाती थी हमें
दिखती तो नहीं थी पर वो पायल की आवाज सुनाइए देती थी
परेशान हुआ करते थे, तब इल्म ऐ मोहब्बत न हुई थी हमें

मिले थे कभी उन गलियों में, उन बुतखानों में, कभी प्याला चाय नसीब होती थी हमें
ख़ुद की कभी तो उनकी कभी दो बातें कर लेते थे, लगता था की कुछ जल्दी थी हमें
रात के फासले बढ़ते चले गए, मिलन की घडियां कम होती रहीं
बेताब रहते थे हमेशा, तब इल्म ऐ मोहब्बत हुई थी हमें

आज उम्र ढल चली है, साथी थे वो कभी, हमसफ़र आज कोई और है
ख्वाब थे कभी, अब बसर कहीं और है,
खुशनुमा साथ तो रहा हमारा हमसफ़र, जाने दिल में आज भी कोई और है
ऐ खुदा अब सोचते हैं, गई उम्र में कभी इल्म ऐ मोहब्बत थी हमें आज कोई और है

उलझे ख्याल

बेवजह तंग करना तेरी आदत रही, देकर छीन लेना तेरी आदत रही
तुझसे क्या फरियाद करुँ, बच्चों सी हरकतें तेरी आदत रही

जो तू न होता नादान, आलिम होता कोई
जो होती मोहब्बत कभी तुझको, इंसान होता कोई

तकदीर लिखना तो आसान रहा तेरा, कभी जी भे ले
तमाशाई ज़िन्दगी बहुत देख ली, ग़म के आंसू कभी पी भी ले

आ'ईनाह-साज़, खालिक, याज्दान जाने और कितने नाम तेरे
इक फरियाद कर कबूल, आशिकी जो न मंज़ूर तो खुदाई तो दे

दीदार

आशिकों की कोई तकदीर नहीं होती,
करार-ऐ-मोहब्बत छोड़ कोई उम्मीद नहीं होती
ऐ तदबीर लिखने वाले तकदीर लिखी किसने तेरी,
के दीदार ऐ मोहब्बत तेरी कभी पूरी नहीं होती

फरियाद

भुला सकता गर कोई उन यादों को, वो खुदा ही होता
होता इतना आसान, इन अल्फाजों को मैं मिटा रहा होता

लिख देता की नई शुरुआत हो हर सुबह, वहीँ जहाँ कल शुरू हुआ था
मुकम्मल हो वहीं जहाँ मैं तेरी बाँहों में सोया हुआ था

समझा न सका, या समझ ना आयी किसी को मेरी फरियाद
बता तो देता कोई, हाल ऐ दिल फ़िर सुना रहा होता

मौसमों को दुहराने की आदत रही, अंधेरों और उजालों को भी
गर वक्त को दायरों की समझ होती, वो भी तारीख दुहरा रहा होता

अमन

कुछ लोग कहते हैं की मिसाल ऐ राह बनाई हमने
जाने कैसे अपनी मंजिलों के हो गए
वक्त तो बढ़ता रहा लेकिन
हम रहे वहीँ, काफिले गुज़र तो गए

देता है क्यों ज़माना तहरीक और किसी की
क्या वो मसीआह कम थे
कामयाब ज़िन्दगी की नहीं
अमन ऐ ज़िन्दगी की खोज में हम थे

Wednesday, December 3, 2008

मवाज्ना

गर मोहब्बत न होती तो जाने हम क्या कर रहे होते
गर आसमान न होता तो जाने सितारे क्या कर रहे होते

उसके आला हुस्न में जीने वाले, उन जुल्फों तले पनाह ले रहे होते
तेरे आला हुस्न में मरने वाले, दिल में जगह बना रहे होते

जो न होते मैखानों में, इतवारे बाजारों में उन्हें ढूँढ रहे होते
कभी मस्जिदों में तो कभी बुतखानों में दुआ मांग रहे होते

Tuesday, December 2, 2008

ज़िन्दगी का मकसद क्या

इस ज़िन्दगी का मकसद क्या है
दो रोटी, कुछ कपड़ा, इक माकन, कुछ अरमान

दो रोटी मेहनत कर पा लेते है
सुखी हुई तो क्या गुज़र कर लेते हैं

तन ढाकने को मिले कुछ चिथडे तो क्या
उन चिथडों को उम्मीदों की डोर से सी लेते हैं

मकान तो रहा ख्वाब सबका
बस टिन के टापरों में सो लेते हैं

रहे कई अरमान, जाने कहाँ से आते हैं
कमबख्त आँसू, बस उनको पिरो लेते हैं

Monday, December 1, 2008

खिड़कियों

खिड़कियों से बाहर ताकते रहे बदलते ज़माने को, उन सलाखों से बाहर झांकते थक गए
उम्मीदों से मकान बनाया था लेकिन, अब केद खानों में बसर करते थक गए

गुलामों सी गुजरी ज़िन्दगी उन कारखानों में, करवटों में गुजरी रातें तहखानों में
वक्त जो मिला कभी कत्ल करने को ढूंढते रहे कभी मैखानों में तो कभी बुतखानों में

जमा करते रहे आँसू, पसीना और खून इक छोटे से ख्वाब के लिए
जमा तो होता रहा खजाना, वक्त न रहा उन पैमानों के लिए

अब मेहनत करने को यह हाथ न रहे काबिल, काम छोड़ आया हूँ
गुजारता हूँ यह दिन कुर्सियों में मशरूफ, अपना नाम कहीं छोड़ आया हूँ

खिड़कियों से बाहर ताकते रहे बदलते ज़माने को, उन सलाखों से बाहर झांकते थक गए
उम्मीदों से मकान बनाया था लेकिन, अब केद खानों में बसर करते थक गए

ख्वाबों की इक डोर

कोई उन नाज़ुक सी कलियों को तोड़ लाया
मेरे ख्वाबों की इक डोर कोई तोड़ आया
बागान को सजाने में उम्र लगी
लगा बाज़ार में आज एक फूल छोड़ आया

गुलाबों के कांटे चुभते रहे मगर
ज़माने से उन कतारों में बोता रहा
फूल खिले बेरंग जाने क्यों
सुर्ख रंगने को अपने लहू में डुबोता रहा

क़र्ज़ था कोई, के भरे हैं ज़माने में चाहने वाले
मोहब्बत कर न सके ज़ालिम, मिले ले जाने वाले
कोई उन नाज़ुक सी कलियों को तोड़ लाया
मेरे ख्वाबों की इक डोर कोई तोड़ आया

अक्स

आज के सैलाब में मेरे बह जाने की बारी है,
आज मेरे गिरेबान में झाँकने की बारी है,
अक्स को अक्सर देखते आया हूँ,
आज ख़ुद को पहचानने की बारी है