लो आज इक और अलविदा हो गया साथी था पर अब विदा हो गया कुछ वक़्त था जो उसके साथ हंस के गुज़ार लेते अब वो भी उस ख़ुशी से जुदा हो गया वो कैसा मकाम था उसे पाना ज़रूरी के वो इस रौशनी पर धुआं हो गया
Thursday, April 29, 2010
उनके होने न होने का क्या गम करें, ज़िन्दगी तो बस यूं ही चली जाएगी दिल को सहलाने को दो आवाज़ और दे देंगे, और ज़िन्दगी बस यूं ही चली जाएगी
साथ हर कदम पर हो कोई यह नामुमकिन है लेकिन मिलते मिलते ज़िन्दगी यूं ही चली जाएगी कुछ दिन और हैं हम यहाँ दोस्त, हाथ बाधा वर्ना तनहा यूं ही ज़िन्दगी निकल जाएगी
इक पल न रुके ज़िन्दगी, रुके हुए तो हम हैं उनके कहे पर इस किनारे रुके हम हैं बहेती हुई नदी किनारे, कई आये कई गए उनके चेहरे की इक नज़र के लिए बेक़रार हम हैं
Monday, March 22, 2010
दिन इतने बेकार न आये अभी, के हाल ऐ दिल गुन-गुना सकें यह वरीदें अब सूख चलीं, कतरा कतरा खून जाम समझ पी चुके मसला ऐ ज़िन्दगी खुद न समझ सके, दूसरों को क्या गले लगायें जा तू जा ऐ दोस्त शायद तुझे तेरी तस्वीर के लिए कोई अक्स मिल जाए
Friday, March 19, 2010
क्या सरहद क्या कौम इस दुनिया को बांटेगी बस वो कौमी हैं जो खुद की हदों को बांटे जीया करते हैं इन बेरहमों को क्या पता दर्द - ऐ - इंसानियत क्या होती है उनको दिए ज़ख्मों में कुछ बूँद खून हमारा भी बहता है हटाओ उन्हें इन कुर्सियों की दीवारों से जो सरहदें बनी बैठी हैं आओ फिर बना लें इक जहान, जहाँ सिर्फ खुशियाँ रहती हैं जहाँ हम तुम पड़ोसियों से गले मिला करते हैं जहाँ हम तुम इंसानों से दिखा करते हैं
Thursday, March 11, 2010
इक कांटे की चुभन को यूं तुमने नकार दिया के आगे वो तूफ़ान तुम्हारी मंजिल तो नहीं इन आंसूओं को बहा ले जाने वाले सैलाब तुम तो नहीं तुम क्या जानो हाल-ऐ-दिल बरबादियों का क्या होता है के बर्बाद कर सबको तुम अपने रोष को कहीं और ले चले
क्या वफ़ा क्या मोहब्बत, मतलबी यहाँ सब हैं
कसूर क्या दें किसीको, के उस और कभी हम हैं
कैसा तूफ़ान था के हमारी पहचान को मिटा गया
उजड़े किनारों पे खड़े हम, और लोग पूछें के हम कौन हैं
Tuesday, March 9, 2010
हर ज़ख्म को तुम्हारी मोहब्बत का तोहफा समझ कर कबूल किया और तुम हो के इक ज़ख्म खा कर ही बेवफा हो गए
किस्मत के पैरों तले रोंदा रेत का इक दाना हूँ में सैंकड़ों इन दानों में दबा इक रेत का दाना हूँ में तेरे इस रोशनियों में जला इक रेत का दाना हूँ में जल के इक आइयेने सा चमका रेत का इक दाना हूँ में हज़ारों टुकड़ों में तोडा इक आइयेना हूँ में बस दूसरों के अक्स से भरा इक आइयेना हूँ में मेरा क्या वजूद के किस्मत के पैरों तले रोंदा इक टूटा आइयेना हूँ में
Wednesday, February 10, 2010
बिगड़े हालातों से डरूं क्यों, वो सुधरे कब थे मेरे नसीब, इन सायों से उभरे कब थे क्यों कोसूं मैं इस ज़िन्दगी को ऐ दोस्त ज़रा याद कर के माज़ी में हम मुस्कुराये कब थे गर याद आया, तो मेरे लफ्ज़ याद रखना के हर वो मुस्कराहट धुल जाएगी आंसूओं से
लफ्ज़-ऐ-दर्द को क्या समझते, खुद में खो जाने वाले इक पिंजरे में बंद कर लेते वो चाहने वाले क्या जूनून उनका के काटा मेरे परों को उनके अक्स सा सजाया मुझको खुद तो वो क़ैद थे ख्वाइशों में बदल रहे हैं क्यों मेरी हकीक़त को ख्वाबों में
Sunday, January 31, 2010
इक फूल तोडा था किसीने, कोने के गुलदस्ते को सजाने को खिला था कुछ वक़्त के लिए, अब उम्र पड़ी है मुरझाने को इक दिन सूख जाऊंगा, मिल जाऊँगा फिर उस मिट्टी में फिर उभर आऊँगा कभी, तेरे दामन पे खिल जाने को
Friday, January 29, 2010
आखिर दर्द से मोहब्बत क्यों, के दर्द तो आखिर दर्द ही तो है जिस हीरे को न तराशा, वो पत्थर भी हीरा तो है क्या अपनाता पसंद इस ज़माने की, छिन लेने के रहे वो जो काबिल तराशा सतह को तो समझा, के ज़माना बेदर्द ही तो है
Monday, January 25, 2010
अपने न बने अपने, न दूसरों को अपना बना पाए देते दूसरों को क्या मिसाल, हम खुद को रास्ता न बता पाए