Monday, December 1, 2008

खिड़कियों

खिड़कियों से बाहर ताकते रहे बदलते ज़माने को, उन सलाखों से बाहर झांकते थक गए
उम्मीदों से मकान बनाया था लेकिन, अब केद खानों में बसर करते थक गए

गुलामों सी गुजरी ज़िन्दगी उन कारखानों में, करवटों में गुजरी रातें तहखानों में
वक्त जो मिला कभी कत्ल करने को ढूंढते रहे कभी मैखानों में तो कभी बुतखानों में

जमा करते रहे आँसू, पसीना और खून इक छोटे से ख्वाब के लिए
जमा तो होता रहा खजाना, वक्त न रहा उन पैमानों के लिए

अब मेहनत करने को यह हाथ न रहे काबिल, काम छोड़ आया हूँ
गुजारता हूँ यह दिन कुर्सियों में मशरूफ, अपना नाम कहीं छोड़ आया हूँ

खिड़कियों से बाहर ताकते रहे बदलते ज़माने को, उन सलाखों से बाहर झांकते थक गए
उम्मीदों से मकान बनाया था लेकिन, अब केद खानों में बसर करते थक गए

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