मीनार बने खड़े रहे, मीनार इ नूर न बन पाए
भटके वो न रास्ते से, आज खुद को जला आये
Wednesday, December 23, 2009
कई दिनों से कुछ लिखा न था
था शौक मगर कलम उठा न था
शब्द पिघल कर बहते तो रहे
धारों को बाँधने मैं उठा न था
इक डोरी से बंधते थे वोह अलफ़ाज़ कभी
इक इक कर गांठों में बंधते थे कभी
मिलते बिछ्ड्ते इक गजरे में पिरो जाते थे
खिलते थे कभी
सूख भी जाते थे
सौंधी सी खुशबू छोड़ जाते थे
महेकती रहती रातें उन हलकी हवाओं में
इक मदहोशी सी छा जाती थी
फिर वोही ख्वाब दोहरा जाती थी
कुछ वक़्त बस यूं ही मस्त रह जाते थे
इ खुदा तेरे इस जहाँ से खो जाते थे
कई दिनों से कुछ लिखा न था
था शौक मगर कलम उठा न था
कलम क्या भरता जब आंसू ही सुख गए
बयां क्या करता जब वो डोर ही टूट गए
था शौक मगर कलम उठा न था
शब्द पिघल कर बहते तो रहे
धारों को बाँधने मैं उठा न था
इक डोरी से बंधते थे वोह अलफ़ाज़ कभी
इक इक कर गांठों में बंधते थे कभी
मिलते बिछ्ड्ते इक गजरे में पिरो जाते थे
खिलते थे कभी
सूख भी जाते थे
सौंधी सी खुशबू छोड़ जाते थे
महेकती रहती रातें उन हलकी हवाओं में
इक मदहोशी सी छा जाती थी
फिर वोही ख्वाब दोहरा जाती थी
कुछ वक़्त बस यूं ही मस्त रह जाते थे
इ खुदा तेरे इस जहाँ से खो जाते थे
कई दिनों से कुछ लिखा न था
था शौक मगर कलम उठा न था
कलम क्या भरता जब आंसू ही सुख गए
बयां क्या करता जब वो डोर ही टूट गए
Thursday, October 22, 2009
इक आवाज़ उठी और फ़िर ठंडी हो गई
इक बात कही फ़िर गुमशुदा सी हो गई
सुना था इक नाम शायद
पर इन नामों में फिर कहीं खो गए
थी पहचान उन दोनों में
जाने फ़िर कहाँ खो गए
काश कहा था शायद
काश ही कहा होगा
मेरी तरह वोह भी इक गुमशुदा सा हुआ होगा
निकला होगा तलाश में किसी की
ख़ुद कहीं खो गया होगा
दे इक और आवाज़ इक और कहार के तू यहीं होगा
दिल का इक टुकडा शायद यहीं कहीं खोया हुआ होगा
इक बात कही फ़िर गुमशुदा सी हो गई
सुना था इक नाम शायद
पर इन नामों में फिर कहीं खो गए
थी पहचान उन दोनों में
जाने फ़िर कहाँ खो गए
काश कहा था शायद
काश ही कहा होगा
मेरी तरह वोह भी इक गुमशुदा सा हुआ होगा
निकला होगा तलाश में किसी की
ख़ुद कहीं खो गया होगा
दे इक और आवाज़ इक और कहार के तू यहीं होगा
दिल का इक टुकडा शायद यहीं कहीं खोया हुआ होगा
Tuesday, September 29, 2009
हलकी सी बारिश
इक प्याला चाय
कुछ गुज़रे लम्हें
फ़िर याद आ जाए
वोह हलकी सी खुशबू
इक बहकी सी हँसी
दबी पैरों की आहट
उन सफों पे हलकी सी नमी
उन बद्रों से घिरे
तेरी बालों की छांव
तेरी छोटी सी आंखों
में इक चमक सी थी
पंखडियों से तेरे लब
थार थार कांपते हुए
उन गर्म साँसों में
मदहोशी सी थी
ख्वाब सी लगती
तेरी अंगडाई
आज ना जाने
ख्वाब सी फ़िर टूट गई
इक प्याला चाय
कुछ गुज़रे लम्हें
फ़िर याद आ जाए
वोह हलकी सी खुशबू
इक बहकी सी हँसी
दबी पैरों की आहट
उन सफों पे हलकी सी नमी
उन बद्रों से घिरे
तेरी बालों की छांव
तेरी छोटी सी आंखों
में इक चमक सी थी
पंखडियों से तेरे लब
थार थार कांपते हुए
उन गर्म साँसों में
मदहोशी सी थी
ख्वाब सी लगती
तेरी अंगडाई
आज ना जाने
ख्वाब सी फ़िर टूट गई
Tuesday, September 22, 2009
Monday, September 7, 2009
Monday, August 31, 2009
Friday, August 14, 2009
Thursday, August 13, 2009
उन आंखों से बहे आंसूओं को पानी न समझो
उन आंसूओं में इक कतरा खून भी मिला हुआ है
जो कभी वो मुस्कुरा भी दिए
उनके दिल में इक काँटा चुब रहा है
गर पोंछ सको तो उन भीगे गालों को पोंछ दो
के उन के आंखों में इक समुन्दर छुपा है
न मारो पत्थर उन लहरों को
के उन लहरों में इक तूफ़ान छुपा है
छोड़ दो देना साथ अपना, के बुझ चुके कई मशाल
इस रौशनी को ठंडे अंगारों का क्या पता है
झुलसते रहे अंगार इतने
के दर्द में आज तड़पने का कुछ और ही मजा है
उन आंसूओं में इक कतरा खून भी मिला हुआ है
जो कभी वो मुस्कुरा भी दिए
उनके दिल में इक काँटा चुब रहा है
गर पोंछ सको तो उन भीगे गालों को पोंछ दो
के उन के आंखों में इक समुन्दर छुपा है
न मारो पत्थर उन लहरों को
के उन लहरों में इक तूफ़ान छुपा है
छोड़ दो देना साथ अपना, के बुझ चुके कई मशाल
इस रौशनी को ठंडे अंगारों का क्या पता है
झुलसते रहे अंगार इतने
के दर्द में आज तड़पने का कुछ और ही मजा है
Monday, July 20, 2009
था वोह घर का चिराग, जो घर को जला आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया
बांटा न था समंदर ने कभी, न कोई इस ज़मीन को चीर पाया
था वो अपना ही कभी, जो हमें दफन कर आया
कैसी मजबूरी, कैसा मजहब, कैसा ईमान, कैसा इंसान
जो इक माँ को अपने बच्चों से अलग कर आया
था वोह घर का चिराग, जो घर को जला आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया
बहती थी नदियाँ खुशियों की कभी, इन खेतों में फसलें लहराया करती थीं
अब बहते हैं कतरे खून के, इंसान जाग तू अपनों को अपना न समझ पाया
खिंची थी लकीरें किसी ने बांटने मजहबों को, जिन्हें हम ने कभी न गैर बुलाया
आ गले लग जा, मिला कदम साथ चलें के खुशहाली का मौसाम फ़िर लौट आया
था वोह घर का चिराग, जो घर लौट आया
न था वो कोई मेहमान, मेरा अपना था जिसे आज फ़िर मैं अपना बना आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया
बांटा न था समंदर ने कभी, न कोई इस ज़मीन को चीर पाया
था वो अपना ही कभी, जो हमें दफन कर आया
कैसी मजबूरी, कैसा मजहब, कैसा ईमान, कैसा इंसान
जो इक माँ को अपने बच्चों से अलग कर आया
था वोह घर का चिराग, जो घर को जला आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया
बहती थी नदियाँ खुशियों की कभी, इन खेतों में फसलें लहराया करती थीं
अब बहते हैं कतरे खून के, इंसान जाग तू अपनों को अपना न समझ पाया
खिंची थी लकीरें किसी ने बांटने मजहबों को, जिन्हें हम ने कभी न गैर बुलाया
आ गले लग जा, मिला कदम साथ चलें के खुशहाली का मौसाम फ़िर लौट आया
था वोह घर का चिराग, जो घर लौट आया
न था वो कोई मेहमान, मेरा अपना था जिसे आज फ़िर मैं अपना बना आया
Wednesday, June 17, 2009
Wednesday, May 27, 2009
इक अजनबी, झोंका सा बन आकर चला गया
अपने होने का एहसास दिला कर चला गया
धुन्दला सा चेहरा दिखा कर कुछ लम्हे
मुलाकात के बढा कर चला गया
क्या चाहता था, जानता नहीं
लेकिन वो मेरे वजूद का हिस्सा बनकर चला गया
तोड़ गया इक टहनी
अपने से जोड़ते चला गया
उसके वजूद का हिस्सा क्या मैं
मेरे वजूद का हिस्सा क्या वो
बे-एहसास वो आया था
बे-एहसास वो चला गया
अपने होने का एहसास दिला कर चला गया
धुन्दला सा चेहरा दिखा कर कुछ लम्हे
मुलाकात के बढा कर चला गया
क्या चाहता था, जानता नहीं
लेकिन वो मेरे वजूद का हिस्सा बनकर चला गया
तोड़ गया इक टहनी
अपने से जोड़ते चला गया
उसके वजूद का हिस्सा क्या मैं
मेरे वजूद का हिस्सा क्या वो
बे-एहसास वो आया था
बे-एहसास वो चला गया
Tuesday, May 19, 2009
Friday, May 15, 2009
बीती बातों,
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
उलटी सीधी,
वो मुलाकातें कैसे मैं याद दिलाऊँ
वो खामोशी,
वो मुस्कुराहटें कैसे मैं वापिस लाऊँ
बीती बातों,
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
भूली भुलाई,
वो सौगाते रातों की वो बरसातें,
को कैसे मैं भुलाऊँ
छुपती छुपाती,
वो मुलाकातें,
मिलती बिछ्ड्ती उन नज़रों को कैसे भुलाऊँ
आती जाती,
वो यादें,
उभरती बहती,
वो चाहतों को कैसे मैं भुलाऊँ
बीती बातों,
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
उलटी सीधी,
वो मुलाकातें कैसे मैं याद दिलाऊँ
वो खामोशी,
वो मुस्कुराहटें कैसे मैं वापिस लाऊँ
बीती बातों,
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
भूली भुलाई,
वो सौगाते रातों की वो बरसातें,
को कैसे मैं भुलाऊँ
छुपती छुपाती,
वो मुलाकातें,
मिलती बिछ्ड्ती उन नज़रों को कैसे भुलाऊँ
आती जाती,
वो यादें,
उभरती बहती,
वो चाहतों को कैसे मैं भुलाऊँ
बीती बातों,
बहकी बातें,
कैसी बातें,
तुझे मैं क्या बताऊँ
Thursday, May 7, 2009
Monday, April 20, 2009
इक ख्वाब में जन्मा, इक ख्वाब में गुज़र जाऊँगा
ख्वाब ही है लेकिन, मैं इक ख्वाब के लिए जिए चला जाऊँगा
कुछ अरसे से बूंदों ने भिगोया इस सुखी धरती को
कुछ बूंदों से मैं जलती मशाल बुझा जाऊँगा
कुछ सूखे पत्ते उन पन्नों से पलटे उम्र से उड़ते ही चले गए
सूखे उन पत्तों को उन खाली पन्नों को कभी पूरा न कर पाऊँगा
ख्वाब तो था हकीकत न समझ पाया आँख बंद कर चलता चला गया
ऊँगली ज़िन्दगी की पकड़ चलता चला गया
उन ख़्वाबों को इन आंखों में बंद कर चलता चला गया
मंजिल का क्या है पहुँचा तो क्या हुआ न पहुँचा तो क्या हुआ
नकारा जो खुदा ने तो क्या हुआ
इन ख़्वाबों को ही जन्नत समझ चलता चला गया
इक ख्वाब में जन्मा, इक ख्वाब में गुज़र जाऊँगा
ख्वाब ही है लेकिन, मैं इक ख्वाब के लिए जिए चला जाऊँगा
ख्वाब ही है लेकिन, मैं इक ख्वाब के लिए जिए चला जाऊँगा
कुछ अरसे से बूंदों ने भिगोया इस सुखी धरती को
कुछ बूंदों से मैं जलती मशाल बुझा जाऊँगा
कुछ सूखे पत्ते उन पन्नों से पलटे उम्र से उड़ते ही चले गए
सूखे उन पत्तों को उन खाली पन्नों को कभी पूरा न कर पाऊँगा
ख्वाब तो था हकीकत न समझ पाया आँख बंद कर चलता चला गया
ऊँगली ज़िन्दगी की पकड़ चलता चला गया
उन ख़्वाबों को इन आंखों में बंद कर चलता चला गया
मंजिल का क्या है पहुँचा तो क्या हुआ न पहुँचा तो क्या हुआ
नकारा जो खुदा ने तो क्या हुआ
इन ख़्वाबों को ही जन्नत समझ चलता चला गया
इक ख्वाब में जन्मा, इक ख्वाब में गुज़र जाऊँगा
ख्वाब ही है लेकिन, मैं इक ख्वाब के लिए जिए चला जाऊँगा
Friday, April 17, 2009
Tuesday, April 7, 2009
इक पत्थर सी मैं पड़ी रही
तेरी यादों में बसी रही
दबी आवाज़ न सुना पायी
दिल की बात न बता पायी
ठोकर थी तेरी क़दमों की
तुझे वापस न बुला पायी
पड़ी हूँ इन सड़कों पे
तुझे आवाज़ न लगा पायी
दबती रही उन क़दमों तले
ख़ुद को न उठा पायी
रोज़ इक दुआ करती हूँ
उसका नाम लिए डरती हूँ
मिल जाऊं किसी छेनी से
इक अकार सी बन जाऊं
दिल की करार सी बन जाऊं
इक हो जाऊं तुझ से मैं
तेरे मकबरे पे लगाया पत्थर बन जाऊं
तेरी यादों में बसी रही
दबी आवाज़ न सुना पायी
दिल की बात न बता पायी
ठोकर थी तेरी क़दमों की
तुझे वापस न बुला पायी
पड़ी हूँ इन सड़कों पे
तुझे आवाज़ न लगा पायी
दबती रही उन क़दमों तले
ख़ुद को न उठा पायी
रोज़ इक दुआ करती हूँ
उसका नाम लिए डरती हूँ
मिल जाऊं किसी छेनी से
इक अकार सी बन जाऊं
दिल की करार सी बन जाऊं
इक हो जाऊं तुझ से मैं
तेरे मकबरे पे लगाया पत्थर बन जाऊं
Friday, April 3, 2009
Thursday, March 19, 2009
केढा चूल्हा नहियों जलया,
अंगारां वर्गे जल्दे दिल,
फुक्दे सी सारे कंडे पाके,
बालां सबदे झुलस्दे सी,
तपदे हाथां ने परसदा बंटया,
सांझे चूल्हे किथे सी,
मक्की वर्गी मैं पकदी सी,
लस्सी रिद्की ख़ुद वि रिद्की,
आसुओं दा नमक मिलांदी सी,
की करदी की न करदी मैं किथे जान्दी सी,
दित्ते तेरे कम नु बस करदी जांदी सी
पौ फट्टे कन्देयाँ वर्गान जल्दी सी
रति उन अंगारां नु ठंडे कर के मर जांदी सी
अंगारां वर्गे जल्दे दिल,
फुक्दे सी सारे कंडे पाके,
बालां सबदे झुलस्दे सी,
तपदे हाथां ने परसदा बंटया,
सांझे चूल्हे किथे सी,
मक्की वर्गी मैं पकदी सी,
लस्सी रिद्की ख़ुद वि रिद्की,
आसुओं दा नमक मिलांदी सी,
की करदी की न करदी मैं किथे जान्दी सी,
दित्ते तेरे कम नु बस करदी जांदी सी
पौ फट्टे कन्देयाँ वर्गान जल्दी सी
रति उन अंगारां नु ठंडे कर के मर जांदी सी
Monday, March 16, 2009
तेनु अवाजां लांदी हाँ
मैं कल्ली की करदी
तेरी ज़रूरत मेनू
तू न होंदा ते मैं की करदी
छड्या जग नु मैंने
कल्ली मैं की करदी
दुआवां रोज मंगदी हाँ
ऐ जिस्म मैनू छड़ दे
इन सासां नु फड के
किथे कैद कर दे
यादां भैडी नि मेरियाँ
उनु ख़त्म कर दे
दे दे इक आवाज़ मैनू
रहम कर दे
सब छड़ चल्ली आई हाँ तेरे कोल
कुछ ते सबर कर ले
बिछडे दिलं नु फ़िर
तू इक कर ले
तेनु अवाजाँ लांदी हाँ
मैं कल्ली की करदी
तेरी ज़रूरत मेनू
तू न होंदा ते मैं की करदी
मैं कल्ली की करदी
तेरी ज़रूरत मेनू
तू न होंदा ते मैं की करदी
छड्या जग नु मैंने
कल्ली मैं की करदी
दुआवां रोज मंगदी हाँ
ऐ जिस्म मैनू छड़ दे
इन सासां नु फड के
किथे कैद कर दे
यादां भैडी नि मेरियाँ
उनु ख़त्म कर दे
दे दे इक आवाज़ मैनू
रहम कर दे
सब छड़ चल्ली आई हाँ तेरे कोल
कुछ ते सबर कर ले
बिछडे दिलं नु फ़िर
तू इक कर ले
तेनु अवाजाँ लांदी हाँ
मैं कल्ली की करदी
तेरी ज़रूरत मेनू
तू न होंदा ते मैं की करदी
Sunday, March 15, 2009
दिल में बसी हैं, तेरी ही यादें,
आशिक सा मैं हूँ, दुआओं में तू
आखों में तेरी, मेरी ही सूरत
बाकी है अब भी, तेरी आरज़ू
कुछ तो बता दे, क्या कमी है
खामोश सी क्यों है, क्या है जुस्तजू
छोड़ो यह बातें, बाँहों में आके
दिल में समाके, बस जा तू
फैला दे जुल्फें, आँचल सी तेरी
तुझ से लिपट के, महकी सी बातें सुनूँ
उन आसुओं में बह न जाऊं
उन घटाओं में साथ उडूं
आ जाओ मेरी जान ऐ तमन्ना
दिल में हैं जो बातें, तुझसे करुँ
आशिक सा मैं हूँ, दुआओं में तू
आखों में तेरी, मेरी ही सूरत
बाकी है अब भी, तेरी आरज़ू
कुछ तो बता दे, क्या कमी है
खामोश सी क्यों है, क्या है जुस्तजू
छोड़ो यह बातें, बाँहों में आके
दिल में समाके, बस जा तू
फैला दे जुल्फें, आँचल सी तेरी
तुझ से लिपट के, महकी सी बातें सुनूँ
उन आसुओं में बह न जाऊं
उन घटाओं में साथ उडूं
आ जाओ मेरी जान ऐ तमन्ना
दिल में हैं जो बातें, तुझसे करुँ
Friday, March 13, 2009
Thursday, March 12, 2009
रोशिनी होगी उन अंधेरों की कभी कहते हैं
मुझे अंधेरों के सिवा कुछ दिखता ही नहीं
हर कदम पे साथ रहेगा कहते हैं
ठोकरों के सिवा कुछ मिला ही नहीं
सर्वज्ञानी वो खुदा कर्म साथी सबका कहते हैं
एक टुक कर्म करता रहा पर साथ मिला ही नहीं
बंधा तेरा नसीब तेरे नाम से कहे वही लोग
सन्नाटों के सिवा कुछ सुनाई देता ही नहीं
अंध विश्वासी वो लोग, रास्ता दिखाए वो जो उन्हें फला ही नहीं
अंध विश्वासी मैं जिसने दिल की कभी सुनी ही नहीं
मुझे अंधेरों के सिवा कुछ दिखता ही नहीं
हर कदम पे साथ रहेगा कहते हैं
ठोकरों के सिवा कुछ मिला ही नहीं
सर्वज्ञानी वो खुदा कर्म साथी सबका कहते हैं
एक टुक कर्म करता रहा पर साथ मिला ही नहीं
बंधा तेरा नसीब तेरे नाम से कहे वही लोग
सन्नाटों के सिवा कुछ सुनाई देता ही नहीं
अंध विश्वासी वो लोग, रास्ता दिखाए वो जो उन्हें फला ही नहीं
अंध विश्वासी मैं जिसने दिल की कभी सुनी ही नहीं
Monday, March 2, 2009
नज़र उठा, कदम बढ़ा
ज़िन्दगी के रस्ते हुए शुरू अभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
मंजिलें मिली नहीं मुझे अभी
किसका वास्ता, अपना रास्ता
मुश्किलें ख़तम हुई नहीं है अभी
जरा मुस्कुरा, खिल ज़रा
के इन आसुओं में खुशी थी कभी
यह बता, क्या हुआ
उठे थे तूफ़ान यहाँ कई
तू जगमगा, उड़ ज़रा
इन हवाओं में है उमंग अभी
न घबरा, फ़िर दोबारा
मिलेगी कामयाबी तुझे कभी
खुल ज़रा, मिल ज़रा
दिखेगी वो रोशिनी फ़िर कभी
चल ज़रा, उछल ज़रा
चाहतें है कई अभी
फ़िर ज़रा, होसला बढ़ा
तेरी तकदीर बदलेगी कभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
ज़िन्दगी के रस्ते हुए शुरू अभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
मंजिलें मिली नहीं मुझे अभी
ज़िन्दगी के रस्ते हुए शुरू अभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
मंजिलें मिली नहीं मुझे अभी
किसका वास्ता, अपना रास्ता
मुश्किलें ख़तम हुई नहीं है अभी
जरा मुस्कुरा, खिल ज़रा
के इन आसुओं में खुशी थी कभी
यह बता, क्या हुआ
उठे थे तूफ़ान यहाँ कई
तू जगमगा, उड़ ज़रा
इन हवाओं में है उमंग अभी
न घबरा, फ़िर दोबारा
मिलेगी कामयाबी तुझे कभी
खुल ज़रा, मिल ज़रा
दिखेगी वो रोशिनी फ़िर कभी
चल ज़रा, उछल ज़रा
चाहतें है कई अभी
फ़िर ज़रा, होसला बढ़ा
तेरी तकदीर बदलेगी कभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
ज़िन्दगी के रस्ते हुए शुरू अभी
नज़र उठा, कदम बढ़ा
मंजिलें मिली नहीं मुझे अभी
Thursday, February 26, 2009
क्यों

रंग भरी इस दुनिया में यह सुर्ख उभरता क्यों हैं
जली उस मांग में उतरता क्यों हैं
मासूम उन हातों को यूं जकड़ता क्यों हैं
निचोडा है जिस्म को किसी सांप ने शायद
जली उस मांग में उतरता क्यों हैं
मासूम उन हातों को यूं जकड़ता क्यों हैं
निचोडा है जिस्म को किसी सांप ने शायद
बेरहम सूखे लहू की लकीरों में मेहंदी सा सजता क्यों है
कातिल हैं शायद उन ख़्वाबों का
मासूम एहसास और नादान वादों का
कुछ वक्त तक चमकेगा बिंदिया बनकर, गुम जायेगा
गुलाल सा इक दिन धुल जाएगा, मिट जाएगा फरेबी
कातिल हैं शायद उन ख़्वाबों का
मासूम एहसास और नादान वादों का
कुछ वक्त तक चमकेगा बिंदिया बनकर, गुम जायेगा
गुलाल सा इक दिन धुल जाएगा, मिट जाएगा फरेबी
बस वो नादान असलियत के सामने झुक जाएगा
चूर हो जाएगा
बेडियाँ
साकित पानी को छलकाया न करो
सोती उन तितलियों को उडाया न करो
उन कच्ची कलियों में जान अब भी बाकी है
उन्हें अपने बालों में यूं सजाया न करो
सकून मिलता रहा जब गुलशन में फूल खिलते थे
दैरा उफक में जब धनुक दिखा करते थे
इक कालीन सी जब बिछ जाती थी बहार
उस शबनम और धुंद में जब तुम न दिखा करते थे
उल्फत न थी कभी, ज़िन्दगी बस यूं ही गुज़रती थी
हर दिन हर रात इक नई बात हुआ करती थी
कल की तो न कभी सोचा करते थे
दोस्तों के संग सिर्फ़ आज की बात हुआ करती थी
उमंग भरी ज़िन्दगी कब गुज़र गई पता न चला
आज़ाद को पिंजरे का पता न चला
वो गैर अपने कब बने पता न चला
मकाम कब बदल गए पता न चला
इसे तुम कोई शिकायत न समझ लेना
फासला बढ़ाने का कोई ख्याल न समझ लेना
तसव्वुरी तो कभी थे हे नहीं
गुमशुदा दिल की अफरा तफरी समझ लेना
मसला न था कोई जब मिले थे
न संग रहे तबाह हुए थे
न बदला था कुछ इन सालों में
न हम कभी बेवफा हुए थे
खिली थी कभी कलियाँ इन शाखों पे
परिंदे भी कभी दिखा करते थे
लिपटे थे बेल से कभी तुम आसमान को छूने को
सूखे शाख अब झुका करते हैं
टूट गिरने से पहले मैं फिर उड़ना चाहता हूँ
बेफिक्र फिर खिलना चाहता हूँ
इक बार ही सही पर फ़िर दिल की करना चाहता हूँ
नफा को नफरत में न बदलने देना
मैं बस इन बेडियों से निकलना चाहता हूँ
सोती उन तितलियों को उडाया न करो
उन कच्ची कलियों में जान अब भी बाकी है
उन्हें अपने बालों में यूं सजाया न करो
सकून मिलता रहा जब गुलशन में फूल खिलते थे
दैरा उफक में जब धनुक दिखा करते थे
इक कालीन सी जब बिछ जाती थी बहार
उस शबनम और धुंद में जब तुम न दिखा करते थे
उल्फत न थी कभी, ज़िन्दगी बस यूं ही गुज़रती थी
हर दिन हर रात इक नई बात हुआ करती थी
कल की तो न कभी सोचा करते थे
दोस्तों के संग सिर्फ़ आज की बात हुआ करती थी
उमंग भरी ज़िन्दगी कब गुज़र गई पता न चला
आज़ाद को पिंजरे का पता न चला
वो गैर अपने कब बने पता न चला
मकाम कब बदल गए पता न चला
इसे तुम कोई शिकायत न समझ लेना
फासला बढ़ाने का कोई ख्याल न समझ लेना
तसव्वुरी तो कभी थे हे नहीं
गुमशुदा दिल की अफरा तफरी समझ लेना
मसला न था कोई जब मिले थे
न संग रहे तबाह हुए थे
न बदला था कुछ इन सालों में
न हम कभी बेवफा हुए थे
खिली थी कभी कलियाँ इन शाखों पे
परिंदे भी कभी दिखा करते थे
लिपटे थे बेल से कभी तुम आसमान को छूने को
सूखे शाख अब झुका करते हैं
टूट गिरने से पहले मैं फिर उड़ना चाहता हूँ
बेफिक्र फिर खिलना चाहता हूँ
इक बार ही सही पर फ़िर दिल की करना चाहता हूँ
नफा को नफरत में न बदलने देना
मैं बस इन बेडियों से निकलना चाहता हूँ
Wednesday, February 25, 2009
Tuesday, February 24, 2009
Tuesday, February 17, 2009
हर मोड़ पे मंज़र से लोग भी बदल जाते
वफ़ा का क्या जब रिश्ते ही बदल जाते हैं
ख़ाक चुनते रहते है इंसान मिले टुकड़े कहीं ख़्वाबों के
उन ख़्वाबों का क्या जब चेहरे ही बदल जाते हैं
इस तकल्लुफ भरी ज़िन्दगी में बने निशाँ ख्वाइश है सबकी
अपने माज़ी के निशाँ मिटाते चलते जाते हैं
मिले न मिले मंजिल तकदीर से लड़ने को सभी तैयार
बेवकूफी में सीधे रास्ते छोडे चले जाते हैं
क्या बेताबी रही सबको कुछ बन दिखाने की
बने बनाये मकाम छोडे चले जाते हैं
उनको बेवकूफ बुलाने वालों में सबसे बड़ा मैं भी हूँ
दिल को है आराम बस हराम किए चले जाते हैं
वफ़ा का क्या जब रिश्ते ही बदल जाते हैं
ख़ाक चुनते रहते है इंसान मिले टुकड़े कहीं ख़्वाबों के
उन ख़्वाबों का क्या जब चेहरे ही बदल जाते हैं
इस तकल्लुफ भरी ज़िन्दगी में बने निशाँ ख्वाइश है सबकी
अपने माज़ी के निशाँ मिटाते चलते जाते हैं
मिले न मिले मंजिल तकदीर से लड़ने को सभी तैयार
बेवकूफी में सीधे रास्ते छोडे चले जाते हैं
क्या बेताबी रही सबको कुछ बन दिखाने की
बने बनाये मकाम छोडे चले जाते हैं
उनको बेवकूफ बुलाने वालों में सबसे बड़ा मैं भी हूँ
दिल को है आराम बस हराम किए चले जाते हैं
इक कंकड़ यह दुनिया, काइनात के सामने, इक जोहर से हम हैं
इक बूँद यह ज़िन्दगी, वक्त के समुन्दर में डूबती, रूह उसकी हम हैं
मिट चुकी इक इक करके रोशनियाँ उन तारों की, नूर में तेरे डूबे आज भी हम हैं
सुनो उन की शिकायतों को की मर चुकी मोहब्बत ज़माने से, लोग कहते हैं के पत्थर दिल हम हैं
बना दो बुत हम को भी देखें कब तलक मघ्ज़ याद रखेंगे, भुला भी देंगे तो क्या उन दिलों में बसे हम हैं
इक बूँद यह ज़िन्दगी, वक्त के समुन्दर में डूबती, रूह उसकी हम हैं
मिट चुकी इक इक करके रोशनियाँ उन तारों की, नूर में तेरे डूबे आज भी हम हैं
सुनो उन की शिकायतों को की मर चुकी मोहब्बत ज़माने से, लोग कहते हैं के पत्थर दिल हम हैं
बना दो बुत हम को भी देखें कब तलक मघ्ज़ याद रखेंगे, भुला भी देंगे तो क्या उन दिलों में बसे हम हैं
Monday, February 16, 2009
Thursday, February 12, 2009
Wednesday, February 11, 2009
रुक रुक कर तरंग उठता था मगर किनारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
कुछ टूटा
कुछ भिखरा
उछ्ल्ता रहा
बुदबुदों में उबलता रहा
भंवर में फंसा इंसान सा तड़पता रहा
भाप बन भिखरता रहा
गगन को दामन से लगाये भटकता रहा
उन पहाडों पर सर पटकता रहा
बरसता रहा बरसता रहा
जमता था कभी
कभी पिघलता था
टूटी धाराओं में बहता रहा
बहते आँसू दूसरों को समेटता रहा
सहेमता रहा रेंगता रहा
पगला कर कभी झरनों में
खंड खंड भिखरता रहा जुड़ता रहा बहता रहा
उन सागरों में मिलता रहा
रुक रुक कर तरंग उठता था मगर किनारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
कुछ टूटा
कुछ भिखरा
उछ्ल्ता रहा
बुदबुदों में उबलता रहा
भंवर में फंसा इंसान सा तड़पता रहा
भाप बन भिखरता रहा
गगन को दामन से लगाये भटकता रहा
उन पहाडों पर सर पटकता रहा
बरसता रहा बरसता रहा
जमता था कभी
कभी पिघलता था
टूटी धाराओं में बहता रहा
बहते आँसू दूसरों को समेटता रहा
सहेमता रहा रेंगता रहा
पगला कर कभी झरनों में
खंड खंड भिखरता रहा जुड़ता रहा बहता रहा
उन सागरों में मिलता रहा
रुक रुक कर तरंग उठता था मगर किनारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
Thursday, February 5, 2009
जुबां पे ले आते नाम हमारा तो क्या होता
बुला लेते फ़िर दोबारा तो क्या होता
उनकी आवाज़ को सुनने को तरस चुके हैं आदम
कुछ कोस ही देते तो क्या होता
सफर था साथ तो रास्ते क्यों बदल गए
न मिलता वो रास्ता तो क्या होता
झुकी थी नज़रें कभी नादानी थी शायद
वक्त वहीं थम जाता तो क्या होता
मुझ से पूछो क्या मोल दर्द और तन्हाई का
न होता कतरा खून या आँसू का तो क्या होता
बुला लेते फ़िर दोबारा तो क्या होता
उनकी आवाज़ को सुनने को तरस चुके हैं आदम
कुछ कोस ही देते तो क्या होता
सफर था साथ तो रास्ते क्यों बदल गए
न मिलता वो रास्ता तो क्या होता
झुकी थी नज़रें कभी नादानी थी शायद
वक्त वहीं थम जाता तो क्या होता
मुझ से पूछो क्या मोल दर्द और तन्हाई का
न होता कतरा खून या आँसू का तो क्या होता
Wednesday, February 4, 2009
Monday, February 2, 2009
Friday, January 30, 2009
Wednesday, January 28, 2009
मिसाल
आबाद होते रहे होने वाले, बरबादियों में हम जीते हैं
जाम वो छलकाते रहे, दर्द के कुछ घूँट हम पीते हैं
मिसाल दी थी तेरी ऐ खुदा ज़माने ने
पूजते रहे वो, बुत बने हम जीते हैं
जाम वो छलकाते रहे, दर्द के कुछ घूँट हम पीते हैं
मिसाल दी थी तेरी ऐ खुदा ज़माने ने
पूजते रहे वो, बुत बने हम जीते हैं
Friday, January 23, 2009
झाँका जो उनकी आंखों में
झाँका जो उनकी आंखों में,
तस्सवुर बस अपना ही दिखता रहा
नकारते रहे वो उम्र भर,
पर झलकता आँसू हमें दिखता रहा
तकदीरों के गाँठ कुछ ऐसे बंधे,
खुलते तो न थे बस काट देते थे
कुछ पलों की खुशी के लिए
खून के आँसू बहा देते थे
कटी थी जुबां बचाने को उन्हें कभी
वरना आज भी उन्हें वापिस बुला रहे होते
तस्सवुर बस अपना ही दिखता रहा
नकारते रहे वो उम्र भर,
पर झलकता आँसू हमें दिखता रहा
तकदीरों के गाँठ कुछ ऐसे बंधे,
खुलते तो न थे बस काट देते थे
कुछ पलों की खुशी के लिए
खून के आँसू बहा देते थे
कटी थी जुबां बचाने को उन्हें कभी
वरना आज भी उन्हें वापिस बुला रहे होते
Thursday, January 22, 2009
था आलम में सुकून
था आलम में सुकून, दिलों में खलबली मचलती रही
अंगारों में हम जलते रहे, मुस्कुराहटें बुझती रहीं
ठुकराए दिल के टुकड़े बांटता हूँ
इसी आस में की ज़िन्दगी जोड़ पायेगी कभी
उल्फत की ज़िन्दगी कहाँ चाही थी, थे ख्वाब हमारे भी कभी
जाने दो उन्हें अब टूट टूट कर थक चुके हैं, ज़िन्दगी और लाएगी कभी
अंगारों में हम जलते रहे, मुस्कुराहटें बुझती रहीं
ठुकराए दिल के टुकड़े बांटता हूँ
इसी आस में की ज़िन्दगी जोड़ पायेगी कभी
उल्फत की ज़िन्दगी कहाँ चाही थी, थे ख्वाब हमारे भी कभी
जाने दो उन्हें अब टूट टूट कर थक चुके हैं, ज़िन्दगी और लाएगी कभी
कुछ उल्टे सीधे ख्याल
कर गुजरने की तमन्ना जाने क्यों लौट आती है
ढलती उम्र में फ़िर जीने की चाह क्यों जाग जाती है
शम्मे जले थे जो उनके आने पर
दबी मोहब्बतों की वो मशाल फ़िर क्यों जल जाती है
जी रहे थे हम कुछ गुमनाम इंसानों से, दूर उन पैमानों से
काफिर की जुबां पे दुआ क्यों आ जाती है
छोड़ते क्यों नहीं पहर इस बेहोशी की हालत में हमको
दर्द में ख़ाक खुशी नज़र आती है
ढलती उम्र में फ़िर जीने की चाह क्यों जाग जाती है
शम्मे जले थे जो उनके आने पर
दबी मोहब्बतों की वो मशाल फ़िर क्यों जल जाती है
जी रहे थे हम कुछ गुमनाम इंसानों से, दूर उन पैमानों से
काफिर की जुबां पे दुआ क्यों आ जाती है
छोड़ते क्यों नहीं पहर इस बेहोशी की हालत में हमको
दर्द में ख़ाक खुशी नज़र आती है
Friday, January 9, 2009
काफिर
काफिर हूँ मैं गर,
खुदा क्या होगा
अँधा किया ज़माने ने जाने क्या क्या सिखा कर
अंधों को उनका चेहरा कहाँ दिखा होगा
दो अगर आँसू भी बहा दूँ दर्द में कभी
जाने वो क्या कर रहा होगा
खुदा क्या होगा
अँधा किया ज़माने ने जाने क्या क्या सिखा कर
अंधों को उनका चेहरा कहाँ दिखा होगा
दो अगर आँसू भी बहा दूँ दर्द में कभी
जाने वो क्या कर रहा होगा
क्या होगा
जंजीरों में बाँध खजाना भी दोगे तो क्या होगा
टूटे रिश्तों की डोर पकड़ा कर खुदा भी दोगे तो क्या होगा
कटी है उम्र तेरे सायों में, पनाह न दोगे तो क्या होगा
तसव्वुर रहा हमेशा तेरा सामने मेरे, असलियत में क्या होगा
सवालों में कटी ज़िन्दगी, जवाब न दोगे तो क्या होगा
आखों को मूँद कर सो जाऊं, शायद येही तकदीर मेरी
गर न उठा तो क्या होगा
टूटे रिश्तों की डोर पकड़ा कर खुदा भी दोगे तो क्या होगा
कटी है उम्र तेरे सायों में, पनाह न दोगे तो क्या होगा
तसव्वुर रहा हमेशा तेरा सामने मेरे, असलियत में क्या होगा
सवालों में कटी ज़िन्दगी, जवाब न दोगे तो क्या होगा
आखों को मूँद कर सो जाऊं, शायद येही तकदीर मेरी
गर न उठा तो क्या होगा
सोच
बदलते रहे ख़ुद को ज़माने के लिए
अपने लिए ख़ुद को न बदल सके
बांटी थी खुशी सबसे लेकिन
चाहतों का गम बांट न सके
कुछ तो रहा होगा साकी उनमें
तस्वीरों के पन्ने पलट न सके
अपने लिए ख़ुद को न बदल सके
बांटी थी खुशी सबसे लेकिन
चाहतों का गम बांट न सके
कुछ तो रहा होगा साकी उनमें
तस्वीरों के पन्ने पलट न सके
Tuesday, January 6, 2009
अनुभव
कुछ अनुभवों को बदलने को जाने कितने रंग लगाते चले गए
तस्वीर थी किसी की, किसी और की बनाते चले गए
फुर्सत में भी न मिला आराम, ख़ुद पे इल्जाम लगाते चले गए
जो न मिले वो, बेगानों को अपना बनाते चले गए
तस्वीर थी किसी की, किसी और की बनाते चले गए
फुर्सत में भी न मिला आराम, ख़ुद पे इल्जाम लगाते चले गए
जो न मिले वो, बेगानों को अपना बनाते चले गए
Monday, January 5, 2009
सवाल
ख़्वाबों सी हँसी ये दुनिया
आँख खोल लेता तो क्या होता
काफिलों साथ चलता रहा
कतार तोड़ देता तो क्या होता
निभाए रिश्ते और दायित्व भी
न करता तो क्या होता
जवाबों की कमी न महसूस हुई कभी
सवाल पूछना छोड़ देता तो क्या होता
आँख खोल लेता तो क्या होता
काफिलों साथ चलता रहा
कतार तोड़ देता तो क्या होता
निभाए रिश्ते और दायित्व भी
न करता तो क्या होता
जवाबों की कमी न महसूस हुई कभी
सवाल पूछना छोड़ देता तो क्या होता
निभाना
चाहतें दबाने से कभी दबती नहीं
उम्मीदें बाँधने से कभी बंधती नहीं
जो कलपते रहे तकदीरों पे रोज रोज
उनकी ज़िन्दगी कभी उभरती नहीं
शब्द लिखे लगते रहे बहुत आसान
निभाए निभती नहीं
धुल जाती हैं वो मुस्कुराहटें आसुओं में
कम्भक्त दिल की बातें मुझसे संभालती नहीं
लाचार सा इक कोने में पड़ा रहता हूँ
बेकारी में कलम घिसता रहता हूँ
कहने को रहा इतना की लिखता रहा
जाने ये ज़ुबान क्यों खुलती नहीं
उम्मीदें बाँधने से कभी बंधती नहीं
जो कलपते रहे तकदीरों पे रोज रोज
उनकी ज़िन्दगी कभी उभरती नहीं
शब्द लिखे लगते रहे बहुत आसान
निभाए निभती नहीं
धुल जाती हैं वो मुस्कुराहटें आसुओं में
कम्भक्त दिल की बातें मुझसे संभालती नहीं
लाचार सा इक कोने में पड़ा रहता हूँ
बेकारी में कलम घिसता रहता हूँ
कहने को रहा इतना की लिखता रहा
जाने ये ज़ुबान क्यों खुलती नहीं
Sunday, January 4, 2009
पत्थर
हरी वादियाँ
गुमनाम शेहर
कुछ घरोंदे
भूले पहर
दो दिन गुजार आया था उनमें गुमनाम मैं भी
ज़िन्दगी के कुछ पलों को भुला आया था
भटकता रहा जहाँ दिल ले गया
तेरी कुछ यादों को साथ जो ले आया था
उन तारों में तेरी आंखों की चमक
उन घटाओं में तेरे कजरे की महक
हर घूँट में मदहोशी थी तेरे प्यार की
उन अंगारों में गर्मी तेरे बाँहों की
उन पन्नों पे यादें बिछी थी चान्दिनी सी
हवा के झोकों से पलट भी गयीं
सपना सा था टूट ही गया, दो दिन का वक्त बस यूं ही छूट गया
अब मैं वापिस पत्थरों में हूँ, मेरा भी दिल पत्थर सा हो गया
गुमनाम शेहर
कुछ घरोंदे
भूले पहर
दो दिन गुजार आया था उनमें गुमनाम मैं भी
ज़िन्दगी के कुछ पलों को भुला आया था
भटकता रहा जहाँ दिल ले गया
तेरी कुछ यादों को साथ जो ले आया था
उन तारों में तेरी आंखों की चमक
उन घटाओं में तेरे कजरे की महक
हर घूँट में मदहोशी थी तेरे प्यार की
उन अंगारों में गर्मी तेरे बाँहों की
उन पन्नों पे यादें बिछी थी चान्दिनी सी
हवा के झोकों से पलट भी गयीं
सपना सा था टूट ही गया, दो दिन का वक्त बस यूं ही छूट गया
अब मैं वापिस पत्थरों में हूँ, मेरा भी दिल पत्थर सा हो गया
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