हवा की फूँक से टूट जाए जो पेड़ तो वोह पेड़ कैसा
तूफ़ान ऐ ज़माने से झुक जाए वो इंसान कैसा
तकलीफें बढती गई, ज़ख्म तो नहीं भरा
कुछ कतरे खून के देख घबराए, वो ईमान कैसा
सरहद पर अक्सर दिखते है सन्नाटे फैले
जिस वतन में फैले सन्नाटे, वो वतन कैसा
भूक, तड़प, तकलीफें देख मुह फेर ले
आह छोड़, मुल्लाह की आवाज सुने वो खुदा कैसा
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