सुनाइए देती हैं आवाजें कई इन हवाओं पर
पर इक आवाज़ जाने क्यों सुनाई नहीं देती
बहुत ढूंडा गलियों में बेतहा हुए
पर वो दिखाए नहीं देती
गम ऐ गुलशन के आइयेने बता
वो अपना पता क्यों नहीं देती
छुपाती है गम क्यों अपनों से
अपनी उल्फत बता क्यों नहीं देती
कहते नहीं है हम, उनका दर्द समझ सकते
हाथों में लिया जाम, छुडा नहीं सकते
पता होता के पलक झपकते यूं चले जाओगे
इन जल्लाद पलकों को काट फैकंते
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