शरारती आखें, मसरूफ कदम
छुपते छुपाते,
दौड़ते भागते
बिछडा वोह बचपन
ऐ खुदा उम्र तो बढ़ी है
उन्हें देख लौट आया बचपन
भुला ना पाए वो खेल गुल्लिओं का
वो लोरी, वो आवारापन
सुना जब दहलीज पर
वो खिलखिलाती हँसी
वो उछलना कूदना
वो पेड़ पे पतंग जो फँसी
याद आया माँ का लाड़
वो गुस्सा, वो इंकार
उनके हातों से खाना खाना
और वो आम का झाड़
अब दिखते है ख्वाबों में
धुन्दले से वो दिन
अब साफ़ दिखते है बेटी के आखों में
बिछडे वो दिन
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