यह कैसी नमी हैं बंद तूफानों में
यह कैसी कमी है बेमुहब्बत इंसानों में
यह कैसा मातम कि बरसते रहे
इश्क के नाम पे, हम तरसते रहे
मरासिम तो थे आस्मां और ज़मीन के
मरासिम तो हैं मोहब्बत और कमी के
अंधेरों बाद दिखती तो है रोशिनी
मिलते तो है आदम, हम ही नहीं
ऐ खुदा, क्या मवाज्ना करें
क्या जानें, तू है के नहीं
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