दर्द और तन्हाई का कैसा सिलसिला
वफ़ा ख़ुद से ढूँढ़ते थक गया
तेरी इक नज़र मिले
इक लम्हे के लिए ऐ खुदा
देता न तू वास्ता यूं दर्द का
शक हो चला, तू ही नहीं
होता कुछ तो असर
इश्क मिलना मुझे, मंजूर ही नहीं
दोहराती रही ज़िन्दगी
आ कर चली जाती थी
कैसा बनाया बहाना
मिल कर यूं खो जाती थी
वो आखें, तड़पते लब
बिन बोले सब कह जाती थी
जाते हुए मुड़ना
वो नहीं उसकी रूह आ जाती थी
बसाया था दिल में जो उसको
बस उतने में खुश हो जाती थी
कहूं क्या तुझसे , जानता तू सब है
नादान दिल पे क्या सितम है
छोड़ा जो तुने जो उस तूफ़ान को
ज़िन्दगी बस सहम सी जाती है
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