हाथ कांपते हैं दिवालों पे रंग लगते हुए
बेरंग इस ज़िन्दगी पे सफेदी चडाते हुए
लुत्फ़ उठाती ज़िन्दगी को क्या देखूं
मुझपे कफन ओदते, तुझे दुल्हन बनाते हुए
धुल गए रंग, बह गए वो दरियाओं में
अब किस रंग का वास्ता देगा
लहू भी अब हो चला है बेरंग
ऐ खुदा बोल अब तू कौनसा रंग लेगा
शिकायत नहीं अब कोई लेकिन
दिल की इक तमन्ना रही
कर दे नबीना हमको
काइनात को न दे अंधेरे कोई
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