Thursday, November 20, 2008

आज फिर शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

पेट की आग तो बुझती नहीं
बादल भी आज कहीं दीखते नहीं
इक असरा हुआ है बारिशों को देखे
कडाके की धुप में अब बदन झुलसते हैं

मजबूरी में आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बीज बोते ही ज़मीन दरारों में फट गई
इक किसान की बेटी भूखी अपनी माँ से लिपट गई
आज फिर सेठ अपना सूत लेने आया है
अब वो मकान गिरवी रखने आया है

तकलीफ में आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

भुकमरी में जीने की थोडी आदत सी हो गई थी
प्यासे रहने की भी आदत हो गई थी
हम तो जी लेते लेकिन
हालातों में बच्चों तबियत ख़राब हो गई थी

बच्चों की खातिर आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बचे कुचे पैसों से आज टिकेट ले आया हूँ
बर्तन बेच कुछ खाने को ले आया हूँ
दो दिन लगेंगे शेहर पहुँचने के लिए
जाने किस मुह से भैसों को बेच आया हूँ

पलटते पलटते आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

गाड़ी में बठे बच्चों के सवाल उठते हैं
पूछते हैं की धरती हमारी माँ है, आप ही ने कहा था
दूध दिए भूख मिटाती थी भैसें, आप ही ने तो कहा था
घर जब यहाँ है, कहीं जाने की जरूरत नहीं, आप ही ने तो कहा था

खामोश आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

चुप थी बीवी अब तक, भोव्क्ला कर रो पड़ी
परदा किए मुह तो छुपा लिया, सिसकियों को छुपा ना सकी
आदर जो करना था पति का, दिल की बात बता ना सकी
दामन में छुपा लिया बच्चों को, जवाब न दे सकी

तड़पता, आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

बीडी सुलगाये बैठा हूँ, आखों में धुआं लग घर के चुहले की याद दिलाता है
आँगन में खुशनुमा घराने की याद दिलाता है
खेतों में पकी फसल की याद आती है
उस भुकमरी जिंदगी से पहले की याद आती है

यादों के सहारे, आज शहरों की तरफ़ कदम उठते हैं

शेहर पहुंचे तो सही, फुटपाथ पे अब जीते है
काम मिलता नहीं, भीख मांगकर गुज़र करते हैं
उम्मीदें थी यहाँ आने से पहले, अब यादों पे गुज़र करते हैं
हमारा क्या है, बच्चे झूठे वादों पर गुज़र करते हैं

जाने कब गाँव की तरफ़ कदम उठेंगें
जाने कब कफन खरीदने को पैसे मिलेंगे
अब मैं,
बच्चों को झूठ बोलना छोड़ चुका हूँ
वापिस जाने के सपने देखना छोड़ चुका हूँ

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