Monday, November 24, 2008

आज

आज कुछ सदियाँ इक पल में समां गयीं
आज कुछ कश्तियाँ समुन्दर में समां गयीं

आज कुछ मुल्लाह दुबे अपनी कश्तियों में
आज टूटे कुछ ख्वाब उन बस्तियों में

आज से कोई वालिद न घर आएगा
आज से कभी कभी वो चूल्हा जल पायेगा

आज से उठेंगे कई सवाल उन बच्चों के
आज से न सजेंगे न बाल माँओं के

आज फिर शुरू होती है ज़िन्दगी इंसानों की
आज ख़त्म होती है ज़िन्दगी पैमानों की

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