दिया है हमें क्यों तकल्लुफ इतना
न चाहते हुए भी परेशान हम हैं
उम्र गुजरी है दूसरों की मर्जी से
अब ख़ुद जी लें क्या वोह भी कम है
दो रोटी के मोहताज हैं आदम
ज़िन्दगी के लिए वक्त कहाँ
चरों और आबादी ही आबादी है
खुदा को हमारे लिए वक्त कहाँ
सोचते हैं की खो जाएँ, गुम जाएँ
उन वादियों में जहाँ कोई नहीं
फ़िर सहमें रुक जाते हैं
परेशान, की हमसफ़र कोई नहीं
घर में कह्कशें बच्चों के तो हैं
माँ, बाप, भाई, बहेन, बीवी भी साकी
है सब कुछ और कुछ भी नहीं
बस चंद सासें हैं बाकी
No comments:
Post a Comment