Wednesday, November 26, 2008

कल आज और कल

हाल ऐ दिल मैं क्या बताऊँ, कल आज और कल में पिसता मैं गेहूं
पिंजरे मैं बंद मैं इक कैदी, अपने गुनाहों की सज़ा काटता हूँ

उम्र गुजारी है इस जिस्म मैं कैद, रूह का छूटना अब बाकी है
मुहफिजों की पहरेदारी की क्या ज़रूरत, चाँद सासें अब बाकी हैं

गुज़रते देखे हैं कई इस कैदखाने से कई मुज्रिम कई बेगुनाह
आम दिखते हैं, सब वक्त के कातिल, कौन बेगुनाह

कहानियाँ सुनी कई, मोहब्बत की, दुश्मनी की, बैमानी की और झूटी भी
तकल्लुफ दिखाते हैं, कुछ आँसू भी, रिहाई मांगते है सब पर माफ़ी नहीं

हम तो चुप रहे, कुछ पल, कुछ दिन, कुछ साल, कुछ सदियाँ, जीते रहे
पर बाखुदा इबादत करते रहे, बख्शीश मांगते रहे, कुछ कुछ मरते रहे

ताकते रहे कई अनजान पर उम्र रुखसत होने से रही
अपने भूल गए कहीं इन अंधेरों में, मौत को फुर्सत होने से रही

छोड़ चुका हूँ देखने ख्वाब जन्नत और जहन्नुम के, बस ठंडी सासें लेता हूँ
अंधेरों की जन्नत में जीता हूँ, सवेरों के जहन्नुम में मरता हूँ

No comments:

Post a Comment