Friday, November 21, 2008

हर्फ़

कई नज़्म लिखे जा चुके
कौन पढ़े इस ज़रा सी तुकबंदी को
कुछ अल्फाज़, जो कुछ कह न सके

लिखने की कोशिश तो करते है
हाल ऐ दिल, बयां हम भी
ज़ुबान अक्सर खामोश रह जाती
स्याही के कुछ धब्बे बिखरे अभी

हर्फ़ से अब दिखते हैं वो धब्बे
जुड़े अल्फाज़ उन कागजों पे कभी
जो समझ में आए रख लेता हूँ
ना आए तो फैंक देता हूँ

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