मिले कुछ लोग मुझे आज चौखट पर, हाल मेरा पूछने आए थे
पता था सब उन्हें, बस सवाल पूछने आए थे
राह गुज़रते हुए, झांकते है कई इन दरवाज़ों में
जाने क्या ढूँढ़ते हैं इन टूटी दीवारों में
थे यहाँ कई मर मिटने वाले
हैं यहाँ अब घुट घुट के मरने वाले
ज़माने का क्या हाल है, क्या पता नहीं हमको
चूला नहीं जलता उनका, चले आते हैं जलाने हमको
दफा हो ज़ालिम शहर वालों, ज़रूरत नहीं अब किसी की हमें
कफन पहने सोते हैं, कब्र ख़ुद ही खोद लेंगे
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