कई आए, कई गए, कुछ रुक भी गए
बने यार थोड़े और कुछ दुश्मन भी
भुला गए कई, कई भुला ना पाए
कुछ रिश्ते बने, कुछ बने नहीं
ज़ीनत दिखा दिखा कर
उकसाया था दिल को
ज़माने ने मजबूर करके
फ़साया था दिल को
यार भी थे कभी
दोस्त बन बैठे हैं आज
साथ चलते तो हैं कदम
एक दूसरे से निज़ात
जिम्मेदारीयों से मजबूर
रुखसत कर दिया अलविदाओं को
मुःह फेर लिया चाह-ऐ-दिल से
ज़ालिम ज़माने को दिखाने को
तकदीर तो लिखी थी तुने
क्या लिखा था यह भी ज़ुल्म
दी उम्र कैद की सज़ा
हुए दो मरहूम
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