Tuesday, November 25, 2008

मैं क्यों नहीं

देखे कुछ ख्वाब सच होते हुए, देखा कुछ लोगों को मुस्कुराते हुए
हर तरफ़ हैं फैले तेरे किस्से, उन किस्सों में मैं क्यो नहीं

देखे कुछ ज़ख्मों को भरते हुए, देखा कुछ लोगों को मंजिलों तक पहुंचते हुए
देते है दुआ सब तुझको, उन दुआओं में मैं क्यों नहीं

देखे कई नादान बच्चों को खेलते हुए, दोस्ती बढाते हुए
देते रहे शेह इक दूसरे को, पर मेरा कोई दोस्त क्यों नहीं

देखे कुछ सेहेरों पे बारिश होते हुए, निहारे कई बागान
देते हुए खुशबू फूलों को, पर मैं कभी खिला क्यों नहीं

देते है दुआ सब तुझको, उन दुआओं में मैं क्यों नहीं

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