Friday, November 14, 2008

हीर राँझा


उन यादों पे जीते आए
ज़ख्म कुरेदकर लहू देखते आए
तारिक हमेशा दुहराती रही
कुछ और रांझे मरते आए


तकल्लुफ क्या है ज़माने को
खुशी देखना मंजूर नहीं
मार दिया उन हीरों को
क्या उनकी कोई तकदीर नहीं


तमाशा देखे है यह दुनिया
मारने वाले उन वीरों को
बस छाप जाते हैं
मरने वालों की तस्वीरों को


ऐ खुदा क्या यह मंज़ूर तुझे
क्या खुशी देना मुनासिफ नहीं
माना कुछ ना जाने मोहब्बत
बाकी क्या इंसान नहीं


करता गर तू सब को एक बराबर
मिलता सबको थोड़ा प्यार
ना होता दर्द किसी को
ना होता कोई दुश्वार

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