काफिर कहे ज़माना
यकीन तो हमें भी नहीं
दुआ तो रोज करते हैं
सिर्फ़ उन्हें ही नहीं
इस जालिम ज़माने पर करके भरोसा
जी तो नहीं पाये
अब तेरी उम्मीद पे ही सही
कुछ पल जी आए
क्या पाया, क्या खोया
अब कुछ याद नहीं
थोड़े अंगार उठे उन शोलों से
जले क्या पता ही नहीं
सरकाते हुए इन थके पैरों को
की कोशिश खुदा तक जाने को
मिल जाए कोई मसीअह
दुश्मन ज़माने से अमन कराने को
देखा ना था उन्हें
ना जन्नत, ना जहन्नुम
उम्र गुजार दी घुटने टेक कर
वफ़ा का इनाम क्या, बस ग़म
झुर्रियां निकल आई हैं
इंतज़ार करते करते
ना मिली मोहब्बत
ना खुदा इंतज़ार करते करते
अब निकलती नहीं दुआ
बस आह निकलती है
मिले ना किसी को मोहब्बत
ना खुदाई भी कभी
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