Monday, February 2, 2009

कागज़ कुछ रोज़ से रँगे नहीं कलम की स्याही का क्या करुँ
कुछ रोज़ से मैं होश में हूँ बुतखानों में मैं क्या करुँ
इल्म बस भटकने का रहा शहरों में बसके क्या करुँ
हर कदम पे सवाल तो हैं जवाब जानके मैं क्या करुँ
की तो है सबने अपनी ही आप बितायी सुना के मैं क्या करुँ

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