उठती रही आंधी मिटाती रही निशाँ उन धूल भरी राहों से
गर राख मेरी मिल जाती तो उसे क्या पता होता
लडखडाते कदम फ़िर भी चले जाते हैं जाने क्या तमन्ना है
आज सामने वो खड़ा होता तो मुझे क्या पता होता
ले तराज़ू तोल ले, दो बूँद पानी और चेहरा उसका
प्यासा में फ़िर भी उसके चेहरे के हुस्न में नहा रहा होता
Great work... superb... superlative... especially the first and the third...
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