Tuesday, April 7, 2009

इक पत्थर सी मैं पड़ी रही
तेरी यादों में बसी रही
दबी आवाज़ न सुना पायी
दिल की बात न बता पायी
ठोकर थी तेरी क़दमों की
तुझे वापस न बुला पायी
पड़ी हूँ इन सड़कों पे
तुझे आवाज़ न लगा पायी
दबती रही उन क़दमों तले
ख़ुद को न उठा पायी
रोज़ इक दुआ करती हूँ
उसका नाम लिए डरती हूँ
मिल जाऊं किसी छेनी से
इक अकार सी बन जाऊं
दिल की करार सी बन जाऊं
इक हो जाऊं तुझ से मैं
तेरे मकबरे पे लगाया पत्थर बन जाऊं

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