रुक रुक कर तरंग उठता था मगर किनारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
कुछ टूटा
कुछ भिखरा
उछ्ल्ता रहा
बुदबुदों में उबलता रहा
भंवर में फंसा इंसान सा तड़पता रहा
भाप बन भिखरता रहा
गगन को दामन से लगाये भटकता रहा
उन पहाडों पर सर पटकता रहा
बरसता रहा बरसता रहा
जमता था कभी
कभी पिघलता था
टूटी धाराओं में बहता रहा
बहते आँसू दूसरों को समेटता रहा
सहेमता रहा रेंगता रहा
पगला कर कभी झरनों में
खंड खंड भिखरता रहा जुड़ता रहा बहता रहा
उन सागरों में मिलता रहा
रुक रुक कर तरंग उठता था मगर किनारे तक न पहुँच पाया
भटकता रहा वीरानियों में सहारे तक न पहुँच पाया
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